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आगमसूत्र-हिन्दी अनुवाद
सर्वरत्नमय, स्वच्छ यावत् प्रतिरूप हैं । उस विजयद्वार के ऊपर बहुत से छत्रातिछत्र कहे गये हैं ।
[१७२] हे भगवन् ! विजयद्वार को विजयद्वार क्यों कहा जाता है ? गौतम ! विजयद्वार में विजय नाम का महर्द्धिक, महाधुतिवाला यावत् महान् प्रभाववाला और एक पल्योपम की स्थितिवाला देव रहता है । वह चार हजार सामानिक देवों, चार सपरिवार अग्रमहिषियों, तीन पर्षदाओं, सात अनीकों, सात अनीकाधिपतियों और सोलह हजार आत्मरक्षक देवों का, विजयद्वार का, विजय राजधानी का और अन्य बहुत सारे विजय राजधानी के निवासी देवों और देवियों का आधिपत्य करता हुआ यावत् दिव्य भोगोपभोगों को भोगता हुआ विचरता है । इस कारण हे गौतम | विजयदार को विजयद्वार कहा जाता है । हे गौतम ! विजयद्वार का यह नाम शाश्वत है । यह पहले नहीं था ऐसा नहीं, वर्तमान में नहीं ऐसा नहीं और भविष्य में कभी नहीं होगा-ऐसा भी नहीं, यावत् यह अवस्थित और नित्य है ।
[१७३] हे भगवन् ! विजयदेव की विजया नामक राजधानी कहाँ है ? गौतम ! विजयद्वार के पूर्व में तिरछे असंख्य द्वीप-समुद्रों को पार करने के बाद अन्य जंबूद्वीप में बारह हजार योजन जाने पर है जो बारह हजार योजन की लम्बी-चौडी है तथा सैंतीस हजार नौ सौ अडतालीस योजन से कुछ अधिक परिधि है । वह विजया राजधानी चारों ओर से एक प्राकार से घिरी हुई है । वह प्राकार साढ़े सैंतीस योजन ऊँचा है, उसका विष्कंभ मूल में साढे बारह योजन, मध्य में छह योजन एक कोस और ऊपर तीन योजन आधा कोस है; इस तरह वह मूल में विस्तृत है, मध्य में संक्षिप्त है और ऊपर तनु है । वह बाहर से गोल अन्दर से चौकोन, गाय की पूंछ के आकार का है । वह सर्व स्वर्णमय है स्वच्छ है यावत प्रतिरूप है। वह प्राकार नाना प्रकार के पांच वर्षों के कपिशीर्षकों से सुशोभित है, यथा-कृष्ण यावत् सफेद। वे कंगूरे लम्बाई में आधा कोस, चौड़ाई में पांच सौ धनुष, ऊंचाई में कुछ कम आधा कोस हैं । सर्व मणिमय हैं, स्वच्छ हैं यावत् प्रतिरूप हैं ।
विजया राजधानी की एक-एक बाहा में एक सौ पच्चीस, एक सौ पच्चीस द्वार हैं । ये द्वार साढे बासठ योजन के ऊंचे हैं, इनकी चौडाई इकतीस योजन और एक कोस है और इतना ही इनका प्रवेश है । ये द्वार श्वेत वर्ण के हैं, श्रेष्ठ स्वर्ण की स्तूपिका है, उन पर ईहामृग आदि के चित्र बने हैं यावत् उनके प्रस्तर में स्वर्णमय बालुका बिछी हुई है । उनका स्पर्श शुभ और सुखद है, वे शोभायुक्त सुन्दर प्रासादीय दर्शनीय अभिरूप और प्रतिरूप हैं । उन द्वारों के दोनों तरफ दोनों नैषेधिकाओं में दो-दो चन्दन-कलश की परिपाटी हैं इत्यादि । उन द्वारों के दोनों तरफ दोनों नैषेधिकाओं में दो-दो प्रकण्ठक हैं । वे प्रकंठक इकतीस योजन और एक कोस लम्बाई-चौडाई वाले हैं, उनकी मोटाई पन्द्रह योजन और ढाई कोस है, वे सर्व वज्रमय स्वच्छ यावत् प्रतिरूप हैं । उन प्रकण्ठकों के ऊपर प्रत्येक पर अलग-अलग प्रासादावतंसक हैं । वे इकतीस योजन एक कोस ऊंचे हैं, पन्द्रह योजन ढाई कोस लम्बे-चौड़े हैं । शेष वर्णन विजयद्वार के समान कहना, विशेषता यह है कि वे सब बहुवचन रूप कहना ।
उस विजया राजधानी के एक-एक द्वार पर १०८ चक्र से चिह्नित ध्वजाएँ यावत् १०८ श्वेत और चार दांत वाले हाथी से अंकित ध्वजाएँ हैं । ये सब आगे-पीछे की ध्वजाएँ मिलाकर विजया राजधानी के एक-एक द्वार पर एक हजार अस्सी ध्वजाएँ हैं । विजया