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आगमसूत्र-हिन्दी अनुवाद
ये नित्य कुसुमित रहते हैं, मुकुलित रहते हैं, पल्लवित रहते हैं यावत् ये सर्वरत्नमय हैं, स्वच्छ हैं यावत् प्रतिरूप हैं ।
उन जाइमण्डपादि यावत् श्यामलतामण्डपों में बहुत से पृथ्वीशिलापट्टक हैं, जिनमें से कोई हंसासन समान है, कोई क्रौंचासन समान हैं, कोई गरुड़ासन आकृति हैं, कोई उन्नतासन समान हैं, कितनेक प्रणतासन, कितनेक भद्रासन, कितनेक दीर्घासन, कितनेक पक्ष्यासन, कितनेक मकरासन, वृषभासन, सिंहासन, पद्मासन और कितनेक दिशा-स्वस्तिकासन के समान हैं । हे आयुष्मन् श्रमण ! वहाँ पर अनेक पृथ्वीशिलापट्टक जितने विशिष्ट चिह्न और नाम हैं तथा जितने प्रधान शयन और आसन हैं-उनके समान आकृति वाले हैं । उनका स्पर्श आजिनक, रुई, बूर वनस्पति, मक्खन तथा हंसतूल के समान मुलायम है, मृदु है । वे सर्वरत्नमय हैं, स्वच्छ हैं, यावत् प्रतिरूप हैं । वहाँ बहुत से वानव्यन्तर देव और देवियां सुखपूर्वक विश्राम करती हैं, लेटती हैं, खड़ी रहती हैं, बैठती हैं, करवट बदलती हैं, रमण करती हैं, इच्छानुसार आचरण करती हैं, क्रीडा करती हैं, रतिक्रीडा करती हैं । इस प्रकार वे वानव्यन्तर देवियां और देव पूर्व भव में किये हुए धर्मानुष्ठानों का, तपश्चरणादि शुभ पराक्रमों का अच्छे और कल्याणकारी कर्मों के फलविपाक का अनुभव करते हुए विचरते हैं ।
उस जगती के ऊपर और पद्मवरवेदिका के अन्दर के भाग में एक बड़ा वनखंड कहा गया है, जो कुछ कम दो योजन विस्तारवाला वेदिका के परिक्षेप के समान परिधिवाला है। जो काला और काली कान्तिवाला है इत्यादि पूर्वोक्त वनखण्ड का वर्णन यहाँ कह लेना चाहिए। केवल यहाँ तृणों और मणियों के शब्द का वर्णन नहीं कहना । यहाँ बहुत से वानव्यन्तर देवियां और देव स्थित होते हैं, लेटते हैं, खड़े रहते हैं, बैठते हैं, करवट बदलते हैं, रमण करते हैं, इच्छानुसार क्रियाएँ करते हैं, क्रीडा करते हैं, रतिक्रीड़ा करते हैं और अपने पूर्वभव में किये गये पुराने अच्छे धर्माचरणों का, सुपराक्रान्त तप आदि का और शुभ पुण्यों का, किये गये शुभकर्मों का कल्याणकारी फल-विपाक का अनुभव करते हुए विचरण करते हैं ।
[१६६] हे भगवन् ! जंबूद्वीप के कितने द्वार हैं ? गौतम ! जंबूद्वीप के चार द्वार हैं, यथा-विजय, वैजयन्त, जयन्त और अपराजित ।
[१६७] भगवन् ! जम्बूद्वीप का विजयद्वार कहाँ है ? गौतम ! जम्बूद्वीप नामक द्वीप में मेरुपर्वत के पूर्व में पैंतालीस हजार योजन आगे जाने पर तथा जंबूद्वीप के पूर्वान्त में तथा लवणसमुद्र के पूर्वार्ध के पश्चिम भाग में सीता महानदी के ऊपर जंबूद्वीप का विजयद्वार है। यह द्वार आठ योजन का ऊँचा. चार योजन का चौडा और इतना ही इसका प्रवेश है। यह द्वार श्वेतवर्ण का है, इसका शिखर श्रेष्ठ सोने का है । इस द्वार पर ईहामृग, वृषभ, घोड़ा, मनुष्य, मगर, पक्षी, सर्प, किनर, रुरु, सरभ, चमर, हाथी, वनलता और पद्मलता के विविध चित्र हैं । इसके खंभों पर वज्रवेदिकाओं होने के कारण यह बहुत ही आकर्षक है । यह द्वार इतने अधिक प्रभासमुदाय से युक्त है कि यह स्वभाव से नहीं किन्तु विशिष्ट विद्याशक्ति के धारक समश्रेणी के विद्याधरों के युगलों के यंत्रप्रभाव से इतना प्रभासित हो रह है । यह द्वार हजारों रूपकों से युक्त है । यह दीप्तिमान है, विशेष दीप्तिमान है, देखनेवालों के नेत्र इसी पर टिक जाते हैं । इस द्वार का स्पर्श बहुत ही शुभ है । इसका रूप बहुत ही शोभायुक्त लगता