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________________ 2-4-******* श्री उपदेश शुद्ध सार जी गाथा-५३-५५ *-*-*-*-*--*-*-*-* 6--15-2-1-5-16 * दृढ श्रद्धान, क्षायिक सम्यक्दर्शन होने से (पिपिओ कम्मान) कर्मों का क्षय हो * जाता है (सरनि विलयं च) संसार परिभ्रमण विला जाता है (पिपिओ अन्यान * प्रमोद) अज्ञान में आनंद मानना दूर हो जाता है (न्यान सहावेन अन्मोय ममलं *च) ज्ञान स्वभाव में रमण करने से ममल स्वभाव प्रगट हो जाता है। (नाना प्रकार दिट्ठी) इधर-उधर घूमने वाली दृष्टि छूट जाती है अर्थात् नाना प्रकार मत मतान्तर की मान्यता छूट जाती है (न्यान सहावेन) ज्ञान स्वभाव से (इस्टि परमिस्टी) अपना इष्ट, परम इष्ट, परमेष्ठी पद वाला आत्मा ही है (लिंग च जिनवरिंद) जिनेन्द्र भगवान का जो लिंग अर्थात् मत-भेष है (लिंग सुद्धं) यही शुद्ध लिंग है अर्थात् जिनेन्द्र प्रणीत जो मार्ग है वही सत्य है, जो निश्चय-व्यवहार से शाश्वत है (च) और (कम्म विलयंति) इसी से कर्म विला जाते हैं। (लीनं अनन्तनंतं) अपने अनंत चतुष्टयमयी स्वभाव में लीन रहता है (लीनं सुभाव) स्वभाव की लीनता (न्यान सहकार) ज्ञान के सहकार से होती है (एयं च गुन विसुद्ध) इसी से गुण विशुद्ध होते हैं (एयं तिक्तंति सरनि संसारे) इसी से संसार का परिभ्रमण छूटता है। विशेषार्थ - अपने विमल ममल स्वभाव का दृढ़ अटल श्रद्धान क्षायिक सम्यक्दर्शन है, इससे कर्मों का क्षय होता है, संसार परिभ्रमण विला जाता है। क्षायिक सम्यक्दृष्टि तद्भव या तीसरे भव में मोक्ष चला जाता है। अपने ज्ञान स्वभाव के आश्रय रमण करने से निर्मल भाव प्रगट होता है, अज्ञान जनित सांसारिक प्रपंच में आनंद मानना, प्रमोद भाव समाप्त हो जाता है। नाना प्रकार के मत मतांतर की मान्यता छूट जाती है, अपना ज्ञान स्वभाव आत्मा ही परम इष्ट उपादेय परमेष्ठी है, जिनेन्द्र देव द्वारा निर्दिष्ट मार्ग ही शुद्ध सच्चा मार्ग है, जो द्रव्य लिंग और भाव लिंग रूप निश्चय-व्यवहार से शाश्वत है, यही सत्य है ध्रुव है प्रमाण है। इसी की साधना से कर्मों का क्षय होता है। अपने अनंत चतुष्टयमयी स्वभाव में लीन रहने से गुणों की विशुद्धि होती है, इसी से संसार का परिभ्रमण छूटता है, स्वभाव की लीनता एक मात्र आत्मज्ञान * होने पर ज्ञान के सहकार, साधन से ही होती है। जिनेन्द्र परमात्मा द्वारा निर्दिष्ट मार्ग क्या है ? सम्यकदर्शन ज्ञानचारित्राणिमोक्षमार्ग:।सम्यकदर्शनज्ञानचारित्र कीएकता ही मोक्ष का मार्ग है। इसको उपलब्ध करने का माध्यम - पंच परमेष्ठी पद है। यही महामंत्र है जिसकी साधना से सिद्ध पद शाश्वत ध्रुव स्वभाव प्रगट होता है। मैं आत्मा शुद्धात्मा परमात्मा हूँ, विमल ममल स्वभाव वाला हूँ, त्रिकाल शुद्ध निरावरण चैतन्य ज्योति स्वरूप एक अखंड अविनाशी ध्रुवतत्त्व शुद्धात्मा ही हूँ, इसका दृढ अटल श्रद्धान होना ही क्षायिक सम्यक्दर्शन है। निज शुद्धात्मानुभूति युत निश्चय सम्यक्दर्शन पूर्वक, सम्यज्ञान द्वारा यथार्थ वस्तु स्वरूप जानकर इस बात का दृढ अटल श्रद्धान (मान्यता, प्रतीति) होना कि मैं ममल विमल स्वभाव वाला धुवतत्त्व शुद्धात्मा ही हूँ, यह एक समय की पर्याय और जगत का त्रिकालवर्ती परिणमन जो क्रमबद्ध निश्चित अटल है, सब असत् क्षणभंगुर 3 नाशवान विला जाने वाला है। शुद्ध द्रव्य मैं शुद्ध जीवास्तिकाय हूँ और यह पुद्गल द्रव्य शुद्ध परमाणु रूप है। ऐसा जब दृढ अटल श्रद्धान विश्वास होता है, कोई भ्रम भ्रांति भयभीतपना नहीं रहता वही क्षायिक सम्यक्त्व है, इससे कर्मों का क्षय होता है, संसार परिभ्रमण छूटता है । जो अज्ञान जनित पर्यायी परिणमन में उत्सुकता, आकर्षण महत्व होता था वह छूट जाता है। नाना प्रकार के मत मतांतर की मान्यता भी छूट जाती है। जिनेन्द्र परमात्मा द्वारा प्रणीत मार्ग ही सत्य है, ध्रुव है, प्रमाण है। सम्यकदर्शन, सम्यज्ञान, सम्यक्चारित्र मयी पंच परमेष्ठी पद की साधना से अर्थात् निर्ग्रन्थ वीतराग साधुपद से ही उपाध्याय, आचार्य, अरिहंत, सिद्ध पद होता है तभी आत्मा पूर्ण शुद्ध परमात्मा होता है। अपने अनंत चतुष्टयमयी सर्वज्ञ केवलज्ञान स्वभाव परम पारिणामिक भाव का आश्रय आलम्बन लेने से ही पर्याय में शुद्धि होती है,गुणों में विशुद्धि होती है, कर्मों का क्षय होता है और इसी से संसार परिभ्रमण छूटता है। ज्ञानी के सर्व ही भाव सम्यक्ज्ञान से रचे हुए होते हैं, जबकि अज्ञानी के सर्व ही भाव अज्ञान द्वारा निर्मित होते हैं। साधु ही मोक्षमार्ग का यथार्थ व पूर्ण साधन कर सकते हैं। जो यथार्थ द्रव्यलिंग तथा भावलिंग के धारी हों उन्हीं को साधु कहते हैं। अणुमात्र परिग्रह के रखने से मोह कर्म की गांठ दृढ़ होती है और इससे तृष्णा की वृद्धि होती है। द्रव्यलिंग निमित्तकारण, भावलिंग साक्षात् मुनिपद ॐ है। भावों की शुद्धि से ही कर्मों की निर्जरा होती है। इस तरह भले प्रकार अपने आत्मा को अन्य से भिन्न निश्चय करके जो अपने में तन्मय हो जाता है वह और कुछ चिंता नहीं करता है, वहाँ परमात्म पद प्रगट होता है। जब तक आंशिक रूप से स्पृहा राग भय और क्रोध रहते हैं तब तक वह साधक है, इनसे सर्वथा रहित होने पर वह सिद्ध हो जाता है। E-E-E E- HE-
SR No.009724
Book TitleUpdesh Shuddh Sara
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGyanand Swami
PublisherAkhil Bharatiya Taran Taran Jain Samaj
Publication Year
Total Pages318
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size7 MB
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