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________________ अयोग केवली का काल 5 ह्रस्वाक्षर परिमाण है। नारकियों का उत्कृष्ट भवायुकाल सात नरक पृथ्वियों में क्रमशः 1, 3, 7, 10, 17, 22 तथा 33 सागरोपम है। प्रथम नरक की उत्कृष्ट आयु ही दूसरे नरक की जघन्य आयु है यह क्रम सातवें की जघन्य आयु की गणना में अपनाया जाता है। प्रथम नरक की जघन्य आयु दस हजार वर्ष है जो भवनवासी व व्यन्तर देवों पर समान रूप से लागू होती है। 12 देवलोको में क्रमशः दो, दो से कुछ अधिक, सात, सात से कुछ अधिक, दस, चौदह, सतरह, अठारह फिर क्रमशः एक एक की वृद्धि के साथ सर्वार्थसिद्धि विमान तक 33 सागरोपम की उत्कृष्ट स्थिति पायी जाती है। 5. अन्तर द्वार जीव जिस गति को छोड़कर जाता है और पुनः उसी अवस्था को वापस प्राप्त नहीं हो जाता तब तक का काल अन्तर काल कहलाता है। एकेन्द्रिय जीवों का जन्म-मरण निरन्तर अर्थात् हर समय होता रहता है। मिथ्यात्व का परित्याग करके पुनः मिथ्यात्व को ग्रहण करने का अन्तर काल (उत्कृष्ट एक सौ बत्तीस सागरोपम है। क्षपक, क्षीणमोही तथा सयोग केवली जीवों के मिथ्यात्व व सम्यक्त्व का अन्तर काल नहीं होता। अयोग केवली का अन्तर काल उत्कृष्टतः 6 मास पर्यन्त होता है सास्वादन गुणस्थान से वैक्रियमिश्र काययोग तक का अन्तर काल जघन्य से एक समय होता है। अजीव द्रव्य का अन्तर काल जघन्य से एक समय तथा उत्कृष्ट से अनन्त काल होता है। शेष द्रव्यों का अन्तर काल नहीं है। 6. भाव द्वार औपशमिक, क्षायिक, मिश्र (क्षयोपशमिक), औदयिक, पारिणामिक तथा सन्निपातिक ये जीवों की 6 प्रकार की भाव अवस्थाएं बतलाई गई है। अजीवों में औदयिक व पारिणामिक दो प्रकार की अवस्थाएं पायी जाती हैं। अष्ट करमों में इन भावों की स्थिति का विवेचन इस प्रकार किया जा सकता है- मोहनीय कर्म में औपशमिक, क्षायिक, मिश्र (क्षयोपशमिक) व औदयिक ये 4 भाव होते हैं। शेष घातिया कर्मों में उपर्युक्त में से औपशमिक के अतिरिक्त बाकी के तीन भाव पाये जाते है अघातिया कर्मों के मात्र औदयिक भाव ही पाया जाता है। 7. अल्पबहुत्व द्वार किस प्रकार के जीवों की संख्या या प्रमाण अन्य की तुलना कम या अधिक है इसका वर्णन इस द्वार में किया गया है। गति क्रम में देखें तो चारों गतियों में मनुष्यों का प्रमाण सबसे कम है, नारकी जीवों प्रमाण मनुष्यों से अनन्त गुणा है इनसे असंख्य गिणा देवता हैं। देवों से अनन्तगुणा सिद्ध तता सिद्धों से अनन्त गुणा तिर्यञ्च हैं। गुणस्थानों की अपेक्षा से उपशामक सबसे कम होते हैं, उनसे अधिक क्षपक, उनसे अधिक जिन, उनसे अधिक अप्रमत्तसंयत तथा उनसे संख्यात गुणा अधिक प्रमत्तसंयत होते हैं। इनसे आगे एक-दूसरे से अधिकता के प्रमाण में क्रमशः गुणस्थानक स्थिति है- देशविरत, सास्वादनी, मिश्र, अविरत सम्यकत्वी, सिद्ध तथा मिथ्यात्वी । गुणस्थानवर्ती जीवों में सबसे कम अयोग केवली होते हैं। गति के अलावा मार्गणा व लेश्यादि क्रम में इस द्वार के द्वारा जीव परिमाण को जाना जा सकता है। 84
SR No.009365
Book TitleGunasthan ka Adhyayan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDeepa Jain
PublisherDeepa Jain
Publication Year
Total Pages184
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size2 MB
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