SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 715
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ ॥६९९॥ कल्पसूत्रे [एव नव गणा संभूया] इस प्रकार नौ गण हुए। ॥ चन्दनसभन्दाथै NE बालादि - [तए णं से समणे भगव' महावीरे मज्झिमपावापुरीओ पडिनिक्खमइ] तदनन्तर श्रमण भगवान् महावीरने मध्यम पावापुरी से विहार कर दिया [पडिनिक्खमित्ता अणेगे कन्यकानां भविए पडिबोहमाणे जणवयविहारं विहरइ] विहार करके अनेक भव्य जीवों को प्रति- दक्षिा ; ग्रहणादिक बोध देते हुए जनपद में विचरने लगे [एवं अणेगेसु देसेसु विहरमाणे भगव जणाणं अण्णाणदिण्णमवणीय ते णाणाइसंपत्तिजुए करीअ] इस प्रकार अनेक देशों में विहार करते हुए भगवान ने लोगों की अज्ञान रूपी दरिद्रता को दूर करके उन्हें ज्ञानादि . । संपत्ति युक्त किया [जहा अंबरम्मि पगासमाणो भाणू अंधयारमवणीय जगं हरिसेइ] जैसे आकाश में प्रकाशमान होता हुआ सूर्य अंधकारको दूर करके जगतको हर्षित करता है [तह जगभाणू भगव मिच्छत्तांधयारमवणीय णाणप्पगासेण जगं हरिसीअ] । उसी प्रकार जगद् भानु भगवानने मिथ्यात्व रूपी अन्धकारका निवारण करके ज्ञानके ॥६९९॥
SR No.009361
Book TitleKalpsutram Part 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGhasilal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1973
Total Pages912
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_kalpsutra
File Size49 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy