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उत्पात्रे
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भगवओ महावीरस्स हंसलक्खणे सेयवत्थे आभरणालंकाराइं पडिच्छइ॥४०॥
सुरेन्द्रादी.
नां शिविका शब्दार्थ-[तए णं ते मणुया सुरिंदा असुरकुमारिंदा णागकुमारिंदा सुवण्णकुमा- वहनम् रिंदा य तं सिनियं] उसके बाद वे मनुष्य-सुरेन्द्र, दोनों असुरेन्द्र, दोनों नागकुमारेन्द्र
और दोनों सुपर्णकुमारेन्द्र उस शिबिका को [उव्वहमाणा उत्तरखत्तियकुंडपुरसन्निवेसस्स मझ मज्झेण निग्गच्छंति निग्गच्छित्ता] वहन करते हुए उत्तरक्षत्रियकुण्डपुर संन्निवेश के बीचोंबीच से निकले। निकलकर [जेणेव णायसंडे उज्जाणे तेणेव उवागच्छंति] जहां ज्ञातखण्ड.उद्यान था वहां पहुंचे [उवागच्छित्ता ईसि रयणिप्पमाणं अच्छोप्पेणं भूमिभागेणं सणियं सणियं] पहुंचकर उन्होंने एक हाथ से कुछ कम धरती के ऊपर धीरे धीरे [पुरिससहस्सवाहिणि चंदप्पहं सिवियं ठवेंति] पुरुष सहस्रवाहिणी चन्द्रप्रभा l शिबिका को स्थापित किया [तए णं समणे भगवं महावीरे ताओ सिबियाओ सणियं ... सणियं पच्चोयरइ] तब श्रमण भगवान महावीर उल शिबिका से धीरे-धीरे नीचे उतरे .. १७०॥