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________________ ..... प्रेमापनास ८२८ पर्यवैः पट्स्थानपतितः तत् तेनार्थेन गौतम ! एवम् उच्यते-जघन्यावगाहनकानां द्विप्रदेशिकानां पुद्गलानां अनन्ताः पर्यवाः प्रज्ञप्ताः, उत्कृष्टावगाहनकोऽपि एवञ्चेव अजघन्यानुत्कृप्टावगाहनको नास्ति जघन्यावगाहनकानां भदन्त ! त्रिप्रदेशिकानां पृच्छा, गौतम ! अनन्ताः पर्यवाः प्रज्ञप्ताः तत् केनार्थेन भदन्त ! एवमुच्यते-जघन्यावगाहनकानां त्रिप्रदेशिकानामनन्ताः पर्यवाः, प्रज्ञप्ताः? गौतम ! यथा द्विप्रदेशिको जघन्यावगाहनकः, उत्कृप्टावगाहनकोऽपि एवञ्चैव, एवं अजघन्यानुत्कृष्टावगाहनकोऽपि, जघन्यावगाहनकानां भदन्त ! चतुःप्रदेशी(से तेणटेणं गोयमा! एवं वुच्चइ-जहण्णोगाहणयाणं पोग्गलाणं अणंता पज्जवा पण्णत्ता) इस कारण से हे गौतम ! ऐसा कहा है कि जघन्य अवगाहना वाले पुद्गलों के अनन्त पर्याय हैं (उक्कोसोगाहणए वि एवं चेव) उत्कृष्ट अवगाहना वाला भी ईसी प्रकार (अजहण्णमणुक्कोसोगाहणओ नत्थि) मध्यम अवगाहना वाला द्विप्रदेशी स्कंध नहीं होता (जहण्णोगाहणयाणं भते ! तिपएसियाणं पुच्छा ?) हे भगवन् ! जघन्य अवगाहना वाले त्रिप्रदेशी पुद्गलों की पृच्छा ? (गोयमा ! अणंता पज्जवा पण्णत्ता) हे गौतम ! अनन्त पर्याय कहे हैं (से केणटेणं भते ! एवं चुच्चइ-जहण्णोगाहणगाणं तिपएसियाणं अणंता पज्जवा पण्णता?) किस कारण से हे भगवन ! ऐसा कहा है कि जघन्य अवगाहना वाले त्रिप्रदेशी पुद्गलों के अनन्त पर्याय कहे हैं ? (गोयमा ! जहा दुपएसिए जहण्णोगाहणए उक्कोसोगाहणए वि एवं चेव) हे गौतम ! जैसे जघन्य अवगाहना बाला द्विप्रदेशी वैसा ही जघन्य अवगाहना वाला और जहण्णोगाहणयाणं पोग्गलाणं अणंता पज्जवा पण्णत्ता ?) सारथी गौतम । मे यु छ , धन्य २५॥ नापा पुगताना मनन्त पर्याय छ (उकोसोगाणए वि एवं चेव) SYष्ट मानावा २ ५४ारे (अजहण्णमणुक्कोसोगाहणओ नत्थि) मध्यम मगाउना विशी २४५ नथी छाता __ (जहण्णोगाहणयाणं भते । तिपएसियाणं पुच्छा ?) मापन ! धन्य २५१साना विदेशी युगलानी छ। (गोयमा । अणना पज्जवा पण्णत्ता) 3 गौतम ! मनन्त पर्याय ४ा छे (से केणद्वेणं भंते ! एवं वुचइ जहण्णोगाणगाणं तिपएसियाण अणंता पज्जवा पण्णत्ता ?) श॥ २णे मगवन् । स यु छ ? धन्य साना त्रिप्रदेशी पुगताना अनन्त पर्याय ४ा छ ? (गोयमा ! जहा दुपएसिए जहण्णोगाहणए उक्कोसोगाहणए वि एवं चेव) हे गौतम । म धन्य અવગાહતાવાળા ઢિપ્રદેશ તેમજ જઘન્ય અવગહન વાળા અને ઉત્કૃષ્ટ અવ
SR No.009339
Book TitlePragnapanasutram Part 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGhasilal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1975
Total Pages1196
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_pragyapana
File Size80 MB
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