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________________ १०१४ प्रापना धन्ते ? गौतम ! संख्येयवर्पायुप्केभ्यो नो असंख्येयवर्षायुष्केभ्य उपपद्यन्ते, यदा संख्येयवर्पायुष्ककर्मभूमिगगर्भव्युत्क्रान्तिकमनुष्येभ्य उपपद्यन्ते किं पर्याप्तकेभ्य उपपद्यन्ते, अपर्याप्त भ्यः उपपद्यन्ते ? गौतम ! पर्याप्तकेभ्य उपपद्यन्ते, नो अपर्याप्तकेभ्य उपपद्यन्ते, यदा पर्याप्तकसंख्येयवर्पायुप्कककर्मभूमिगगर्भव्युत्क्रान्तिक मनुष्येभ्य उपपद्यन्ते किं सम्यग्दृष्टिपर्याप्तकसंख्येयवर्पायुष्कर्मभूमि के गर्भजलनुप्यों से उत्पन्न होते हैं (किं संखेजवासाउएहितो, असंखेज्जयासाउएहितो उववज्जंति ?) क्या संख्यात वर्ष की आयु वाले मनुष्यों से उत्पन्न होते हैं या असंख्यात वर्ष की आयु वालों से ? (गोयमा ! संखेज्जवासाउएहितो, नो असंखेज्जवासाउएहितो उववज्जति) गौतम ! संख्यात वर्ष की आयु वालों से उत्पन्न होते हैं असंख्याल वर्ष की आयु वालों से नहीं __(जइ संखेज्जवालाउयकम्मभूमगगम्भवक्कंतियमणूसे हितो उचवजजंति) यदि संख्यात वर्ष की आयु वाले कर्मभूमिक गर्भज मनुष्यों से उत्पन्न होते हैं कि पज्जत्तेहिं उववति, अपज्जत्तेहिं उववज्जति ? क्या पर्याप्तों से उत्पन्न होते हैं या अपर्याप्तों से उत्पन्न होते हैं ? (गोयमा ! पज्जत्तएहितो उववज्जति, नो अपजत्तहितो उववजति) गौतम ! पर्याप्तकों से उत्पन्न होते हैं, अपर्याप्तकों से नहीं उत्पन्न होते (जइ पज्जत्तसंखेजवासाउयकम्लभूमगगम्भवतियमणुस्सेहितो उववति) यदि पर्याप्तक संख्यातवर्षायुष्क कर्मभूमिजगर्भजमनुष्यों से उत्पन्न होते हैं (किं सम्मदिट्टीपज्जत्तगसंखेजवासाउय कम्मभूमिसलर मनुष्याथी उत्पन्न थाय छे. (किं संखज्जवासाउएहितो, असंखेज्जवासाउएहितो उववज्जति ?) शु सच्यात धनी मायुवाणा मनुष्याथी सत्पन्न याय छ या असण्यात वपनो मायुवाणा भनुप्याथी erपन्न याय छे ? (गोयमा ! संखेज्जवासाउएहितो,, नो असंखेजवासाउएहि तो उववज्ज ति) गौतम ! सभ्यात વર્ષની આયુવાળાથી ઉત્પન્ન થાય છે. અસ ખ્યાત આયુવાળાથી નહી. (जइ संखेज्जवासाउयकम्मभूमगगम्भवतियमणूसेहि तो उबमज्जति) यहि સંખ્યાત વર્ષની આયુવાળા કર્મભૂમિજ ગર્ભજ મનુથી ઉત્પન્ન થાય છે. (किं पज्जत्तेहि उववज ति,अपज्जत्तेहि उववज ति ?) शुपस्तिथी उत्पन्न याय छ या अ तीथी उत्पन्न थाय छे ? (गोयमा ! पज्जत्तएहिंतो उववजंति, नो अपज्जत्तएहितो उववजंति ?) गौतम ! पर्याप्तीथी जत्पन्न थाय छे, मर्यास्तथी नयी उत्पन्न यता (जइ पज्जत्तसंखेज्जवासाउयकम्मभूमगगन्भ. वक्कंतिय मस्सेहिंतो उबवज्जति) यहि पयर्यात सध्यात वर्षायुप४ भभूभिन्न । भनुध्याथी स्पन्न थाय छे. (किं सम्मदिट्ठि पज्जत्तगसंखेजवासाउय.
SR No.009339
Book TitlePragnapanasutram Part 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGhasilal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1975
Total Pages1196
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_pragyapana
File Size80 MB
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