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________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir -गुरुवाणी ) पूरा सम्मान रखा गया है. हमारे यहां तो साधु साध्वी को निर्देश दिया है. अतिचार सूत्र होता है. अतिचार कौन कौन से लगे हैं. उसका प्रायश्चित्त पूर्वक मिच्छामि दुक्कडम दिया जाता है. उसी तरह से हमारे यहा पर, अतिचार सूत्र अब साधु बोलते हैं तो कहा गया देवाणंआसाणाय, देवणीणं आसाणाय। यदि कोई साधु देव-देवी की आसातना करे तो मिच्छामि दुक्क्डम् लेना पड़ता है साधु को. आप समझ लें उनका कैसा सम्मान रखा गया. कभी भूलकर भी किसी आत्मा की निन्दा तो कभी नहीं करनी चाहिए. देवी देवताओं की फिर निन्दा क्यों करें. जो निर्दोष किया गया वह किस अपेक्षा से किया गया आप समझ लें. हर मंदिर में अधिष्ठाता देव होते हैं. हर मंदिर में शासन रक्षक देव होते हैं. हर मंदिर के अन्दर मातायें होती हैं. चक्रेश्वरी माता, शासन देवी माता, बराबर उनका सम्मान करते हैं. प्रतिक्रमण में उनका कायोत्सर्ग करते हैं. कि मुझे तुम्हारी शक्ति से ऐसी सहायता मिली. "समाहिमरणं च बोहिलोअ" आरती उतारो, भक्ति करो, भैरो हों, चाहे भद्र हों या कोई भी गुरु हों, यह आसातना नहीं है. यह आसातना भयंकर होती है. मालिक को छोड़कर के नौकर की सेवा करें. आखिर आचार्य हो या देव हो, हैं तो परमात्मा के नौकर, सेवक. ये तो सरासर अविनय है. इस अविनय का परिणाम और ज्यादा दुखी बनना है. और ज्यादा कर्म बन्धन होते हैं. अविनय के द्वारा, ऐसा कार्य कभी नहीं करना. परमात्मा, परमात्मा की जगह है. सर्वोपरि भक्ति जिनेश्वर भगवान की, दूसरी कक्षा में गुरु जनों की, तीसरी कक्षा में देवी देवताओं की. यह इसका अनुक्रम है. आप करिये, कोई निषेध नहीं. दस बार जाइये उनका सम्मान करिये, परन्तु परमात्मा का अविनय करके नहीं. परमात्मा परमात्मा की जगह है, गुरु गुरु की जगह है. मंदिर में सन्मान लेने का नहीं, परमात्मा का अविनय होता है. सारी बातें समझ करके आप चलें. जिस भावना से प्रश्न किया, उसका यह जवाब है. हमारे यहां देवी देवताओं का किसी प्रकार का अविनय नहीं किया गया, उचित सम्मान के लिए यहां निर्देश दिया गया. उनकी आसातना भी नहीं करनी, शक्ति से अपनी अपेक्षा वे बड़े हैं, शक्ति सम्पन्न हैं, उनका पुण्य बल है. आप उनसे याचना करें कि मेरी धर्म साधना में सहायक बनो, मेरे अन्दर जो धर्म क्रिया में अन्तराय है, उसे नष्ट करने वाले बनो. मेरे चित को समाधि मिले, बस यही प्रार्थना करो. बाकी तो प्रभु से याचना होती है. मंगलयाचना. ___जयवीयराय सूत्र में आप क्या मांगते हैं. सभी चीज़ तो आपने परमात्मा से मांग ली बाकी क्या रहा. कभी उस सूत्र का अर्थ पढ़िये, जयवीराय सूत्र याचना सूत्र है. इष्टफल शुद्धि उसमें सब आ गया. मेरी सारी कामना भगवन्, तुम्हारी कृपा से परिपूर्ण बने. 419 For Private And Personal Use Only
SR No.008711
Book TitleGuruvani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPadmasagarsuri
PublisherAshtmangal Foundation
Publication Year1996
Total Pages410
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size20 MB
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