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________________ हरिवंश कथा से यदिचूक गये तो किसी कारण से उदास होकर क्रियाकाण्ड में ही धर्म मानने वाला है उसके सम्यग्दर्शनपूर्वक होनेवाला इन्द्रिय संयम भी कैसे हो सकता है? जो केवल काय-क्लेश को ही तप मानता हो और मान से भरा हो। उसकी तपस्या मुक्ति का साधन कैसे हो सकती है? नहीं हो सकती। जिसने पूर्व जन्म में जिनधर्म की आराधना कर पुण्यार्जन किया है, उसका बड़े से बड़ा शक्तिशाली शत्रु भी कुछ नहीं बिगाड़ सकता। तीर्थंकर जैसे पुण्यवान एवं पवित्र आत्मा जब जगत में जन्म लेते हैं, अवतरित होते हैं तो उनके निमित्त से नगर में सहज-सम्पन्नता हो जाती हैं - तीर्थंकर जीव के सातिशय पुण्य का ऐसा ही प्रभाव होता है, अतः ऐसे कथनों में शंका करने की ऐसी कोई गुंजाइश नहीं है कि देवों द्वारा बरसाये रत्न कैसे होंगे? उनका मार्केट में क्या मूल्य होगा?' यह कथन समृद्धि का प्रतीक भी तो हो सकता है। जैसे लोक में अनाजों की फसलों की आवश्यकतानुसार जब अनुकूल जल वर्षा होती है तो लोग कहते हैं कि “यह पानी नहीं सोना बरस रहा है।" इससे कोई ऐसा नहीं मानता कि ओलों की भाँति स्वर्ण के कण बरसते होंगे और लोग लूटते-फिरते होंगे, झगड़ते होंगे। पुण्यवान पुरुष जहाँ भी जाता है, सफलता उसके चरण ही चूमती है। यदि हम पुण्य कार्य करें तो सफलता हमारे भी चरण चूमेगी। जो होता है वह होनहार और कर्मोदय के निमित्त अनुसार ही होता है। जब जो जिस निमित्त से होना होता है, वह तभी उन्हीं सब कारणों से होकर ही रहता है। अपने किये का फल प्रत्येक प्राणी को भोगना ही पड़ता है। हमारे द्वारा कभी किसी को इसी प्रकार की पीड़ा पहुँचाई गई होगी। उसी का फल हमें मिल रहा है - ऐसे विचार से वैर नहीं बंधता । व्यक्ति पाप तो हँस-हँसकर बाँधता है और जब उसके फल भोगने का समय आता है तो रुदन करता है। अतः अब खोटी करनी से बचना चाहिए। -- -- जब तक प्राणियों को स्व-पर कल्याणकारक धर्म का आलम्बन रहता है; तब तक कषायों की मन्दता रहती है और उन्हें अहंकार-ममकार नहीं होता। इसकारण वे सतत् सातिशय पुण्य बाँधते रहते हैं। फलस्वरूप उन्हें वर्तमान में तो लौकिक अनुकूलता मिलती ही है और आगे चलकर वे अपूर्व पुरुषार्थ से कर्मों का अभाव करके अतीन्द्रिय आनन्द को प्राप्त करते हैं। तथा जो अज्ञान के कारण अहंकारी होकर दूसरों का बुरा-भला करने की ही सोचते रहते हैं वे पुण्यकर्म कम और पाप ही अधिक बाँधते हैं। भगवान कोई अलग नहीं होते। जो भी जीव विश्व कल्याण की भावना भाता है। वह स्वयं तो तत्त्वज्ञान प्राप्त कर वस्तुस्वरूप की यथार्थ समझ से अपने आप में आत्मिक शान्ति, निराकुल सुख एवं आत्मा की अनुभूति तो करता ही है, साथ ही उसके अन्दर ऐसी उज्जवल परोपकार की भावना प्रबलरूप से जागृत होती है कि - "काश! सारा जगत इस स्वतंत्र स्वसंचालित विश्व व्यवस्था को समझ ले तो पर के कर्तृत्व के भार से तथा पर को सुखीदुःखी करने की मिथ्या अवधारणाओं से जो परेशानियाँ होती हैं, वे समस्त परेशानियाँ, सारे मानसिक कष्ट मिट सकते हैं। -- ऐरावत हाथी वस्तुतः अभियोग जाति का देव होता है, जो इन्द्र की आज्ञा और स्वयं की भक्तिभावना से अपनी विक्रिया से ऐरावत हाथी का रूप धारण करता है; इसकारण उसका रूप सामान्य गजराजों से भिन्न अद्भुत हो तो इसमें आश्चर्य और शंका करने की गुंजाइश नहीं है। (२१)
SR No.008389
Book TitleYadi Chuk Gaye To
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMahavir Prasad Jain
PublisherTodarmal Granthamala Jaipur
Publication Year2007
Total Pages85
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Spiritual
File Size276 KB
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