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________________ श्रीसम्यग्ज्ञान पूजन १३. श्री सम्यग्ज्ञान पूजन (गीतिका) प्रभो सम्यग्ज्ञान की पूजन करूँ शुभभाव से। त्वरित ही अज्ञान नाथू जुई आत्मस्वभाव से ।। मोहजन्य कुबुद्धि क्षय कर , प्रभो निज ज्ञान से। पूर्ण केवलज्ञान पाऊँ आत्मा के ध्यान से। ज्ञान का आवरण नायूँ दर्शनावरणी हरूँ। मोह क्षयकर अन्तराय विनाश स्वचतुष्टय वरूँ।। ॐ ह्रीं श्री अष्टविधसम्यग्ज्ञान अत्र अवतर अवतर संवीषट् । ॐ ह्रीं श्री अष्टविधसम्यग्ज्ञान अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनम् । ॐ ह्रीं श्री अष्टविधसम्यग्ज्ञान अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् । (जोगीरासा) तत्त्वज्ञान सागर जल लाऊँ त्रिविध रोग विनशाऊँ। निज अभ्यंतर निर्मल करके शाश्वत निज निधि पाऊँ।। सम्यग्ज्ञान स्वरूप प्रकटकर आत्मज्ञ हो जाऊँ। केवलज्ञान महान प्राप्तकर भवसागर तर जाऊँ।।१।। ॐ ह्रीं श्री सम्यग्ज्ञानाय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा। तत्त्वज्ञान सागर तट जाकर शीतल चंदन लाऊँ। भवज्वरमय संसारताप हर शीतलता उर पाऊँ॥ सम्यग्ज्ञान स्वरूप प्रकटकर आत्मज्ञ हो जाऊँ। केवलज्ञान महान प्राप्तकर भवसागर तर जाऊँ ।।२।। ॐ ह्रीं श्री सम्यग्ज्ञानाय संसारतापविनाशनाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा। तत्त्वज्ञान भू अक्षत लाऊँ अक्षयपद प्रगटाऊँ। भव समुद्र तर शिव तट पाऊँ परमसौख्य उर लाऊँ ।। सम्यग्ज्ञान स्वरूप प्रकटकर आत्मज्ञ हो जाऊँ। केवलज्ञान महान प्राप्तकर भवसागर तर जाऊँ।।३।। ॐ ह्रीं श्री सम्यग्ज्ञानाय अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा। तत्त्वज्ञान के पुष्प सजोऊँ कामबाण विनशाऊँ। महाशील गुणलाख चौरासी निज अंतर में लाऊँ। सम्यग्ज्ञान स्वरूप प्रकटाकर आत्मज्ञ हो जाऊँ। केवलज्ञान महान प्राप्तकर भवसागर तर जाऊँ॥४॥ ॐ हीं श्री सम्यग्ज्ञानाय कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा। तत्त्वज्ञान अनुभवरस निर्मित सुचरु चढ़ाऊँ स्वामी। क्षुधारोग हर निराहार पद पाऊँ अन्तर्यामी।। सम्यग्ज्ञान स्वरूप प्रकटकर आत्मज्ञ हो जाऊँ। केवलज्ञान महान प्राप्तकर भवसागर तर जाऊँ।।५।। ॐ ह्रीं श्री सम्यग्ज्ञानाय क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा। तत्त्वज्ञान की दीप ज्योति ला निज अंतर उजियाऊँ। मोह दुष्ट मिथ्यात्व नष्टकर केवलज्ञान उपाऊँ। सम्यग्ज्ञान स्वरूप प्रकटकर आत्मज्ञ हो जाऊँ। केवलज्ञान महान प्राप्तकर भवसागर तर जाऊँ ।।६।। ॐ ह्रीं श्री सम्यग्ज्ञानाय मोहान्धकारविनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा। तत्त्वज्ञानयुत शुक्लध्यान की धूप ध्यानमय लाऊँ। भव समुद्र तर शिव तट पाऊँ परमसौख्य उर लाऊँ ।। सम्यग्ज्ञान स्वरूप प्रकटकर आत्मज्ञ हो जाऊँ। केवलज्ञान महान प्राप्तकर भवसागर तर जाऊँ।।७।। ॐ ह्रीं श्री सम्यग्ज्ञानाय अष्टकर्मविध्वंसनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा। तत्त्वज्ञानतरू के फल लाऊँ शुद्ध मोक्षफल पाऊँ। अजर अमर अविनाशी पद पा ध्रुवधामी हो जाऊँ ॥ सम्यग्ज्ञान स्वरूप प्रकटकर आत्मज्ञ हो जाऊँ। केवलज्ञान महान प्राप्तकर भवसागर तर जाऊँ।।८।। ॐ ह्रीं श्री सम्यग्ज्ञानाय महामोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा। तत्त्वज्ञान के अर्घ्य संजोऊँ पद अनर्घ्य प्रगटाऊँ । यह संसारभ्रमण विनशाऊँ कर्मबंध विघटाऊँ ।।
SR No.008373
Book TitleRatnatray mandal Vidhan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRajmal Pavaiya Kavivar
PublisherAkhil Bharatiya Jain Yuva Federation
Publication Year2005
Total Pages73
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Ritual_text, Ritual, & Vidhi
File Size280 KB
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