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________________ २१५ ९. ८-१७.] परीषह करना। ७. अरति-अंगीकृत मार्ग मे अनेक कठिनाइयों के कारण अरुचि का प्रसंग आने पर उस समय अरुचि न लाते हुए धैर्यपूर्वक उसमे रस लेना । ८. स्त्री-पुरुष या स्त्री साधक का अपनी साधना मे विजातीय आकर्षण के प्रति न ललचाना । ९. चर्या-स्वीकृत धर्मजीवन को पुष्ट रखने के लिए असंग होकर भिन्न-भिन्न स्थानों मे विहार करना और किसी भी एक स्थान मे नियतवास स्वीकार न करना । १०. निषद्या-साधना के अनुकूल एकान्त स्थान में मर्यादित समय तक आसन लगाकर बैठे हुए साधक के ऊपर यदि भय का प्रसंग आ जाय तो उसे अकम्पितभाव से जीतना अथवा आसन से च्युत न होना । ११. शय्याकोमल या कठोर, ऊँची या नीची, जैसी भी जगह सहजभाव से मिले वहाँ समभावपूर्वक शयन करना। १२. आक्रोश-कोई पास आकर कठोर या अप्रिय वचन कहे तब भी उसे सत्कार समझना । १३. वध-किसी के द्वारा ताड़नतर्जन किये जाने पर भी उसे सेवा ही मानना । १४. याचना-दीनता या अभिमान न रखते हुए सहज धर्मयात्रा के निर्वाहार्थ याचकवृत्ति स्वीकार करना । १५. अलाभ-याचना करने पर भी यदि अभीष्ट वस्तु न मिले तो प्राप्ति के बजाय अप्रासि को ही सच्चा तप मानकर संतोष रखना। १६. रोग-व्याकुल न होकर समभावपूर्वक किसी भी रोग को सहन करना । १७. तृणस्पर्श-संथारे मे या अन्यत्र तृण आदि की तीक्ष्णता अथवा कठोरता अनुभव हो तो मृदुशय्या के सेवन जैसी प्रसन्नता रखना। १८. मल-शारीरिक मैल चाहे जितना हो, फिर भी उससे उद्विग्न न होना और स्नान आदि संस्कारों की इच्छा न करना। १९. सत्कार-पुरस्कार-चाहे जितना सत्कार मिले पर उससे प्रसन्न न होना और सत्कार न मिलने पर खिन्न न होना। २०. प्रज्ञा–प्रज्ञा अर्थात् चमत्कारिणी बुद्धि होने पर उसका गर्व न करना और वैसी बुद्धि न होने पर खेद न करना। २१. अज्ञान-विशिष्ट शास्त्रज्ञान से गर्वित न होना और उसके अभाव में आत्मावमानना न रखना। २२ अदर्शन--सूक्ष्म और अतीन्द्रिय पदार्थों का दर्शन न होने से स्वीकृत त्याग निष्फल प्रतीत होने पर विवेकपूर्वक श्रद्धा रखना और प्रसन्न रहना । ९। लिए सर्वथा नग्नत्व को स्वीकार करके भी अन्य साधको के लिए मर्यादित वस्त्र-पात्र की आज्ञा देते है और तदनुसार अमूर्छित भाव से वस्त्रपात्र रखनेवाले को भी वे साधु मानते है, जब कि दिगम्बर शास्त्र मुनिनामधारक सभी साधको के लिए समानरूप से ऐकान्तिक नग्नत्व का विधान करते है । नग्नत्व को अचेलक परीषह भी कहते है । आधुनिक शोधक विद्वान् वस्त्रपात्र धारण करनेवाली श्वेतांबर परंपरा में भगवान् पार्श्वनाथ की सवस्त्र परम्परा का मूल देखते है और सर्वथा नग्नत्ववाली दिगंबर परंपरा में भ० महावीर की अवस्त्र परंपरा का मूल देखते है । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.008066
Book TitleTattvarthasutra Hindi
Original Sutra AuthorUmaswati, Umaswami
AuthorSukhlal Sanghavi
PublisherParshwanath Vidyapith
Publication Year1976
Total Pages444
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, Epistemology, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size9 MB
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