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________________ ६. ११-२६ ] आठ मूल कर्म - प्रकृतियों के भिन्न-भिन्न बन्धहेतु १६३ ५. अभोक्ष्ण-संवेग -- सासारिक भोगों से जो वास्तव मे सुख के स्थान पर दुःख के ही साधन बनते हैं, डरते रहना अर्थात् कभी भी लालच मे न पड़ना । ६. यथाशक्ति त्याग -- अपनी अल्पतम शक्ति को भी बिना छिपाए आहारदान, अभयदान, ज्ञानदान आदि विवेकपूर्वक करते रहना । ७ यथाशक्ति तप - शक्ति छिपाए बिना विवेकपूर्वक हर तरह की सहनशीलता का अभ्यास । ८. संघसाधुसमाधिकरणचतुर्विध संघ और विशेषकर साधुओ को समाधि पहुँचाना अर्थात् ऐसा करना जिससे कि वे स्वस्थ रहे । ९. वैयावृत्त्यकरण — कोई भी गुणी यदि कठिनाई में पड जाय तो उस समय योग्य ढंग से उसकी कठिनाई दूर करने का प्रयत्न करना । १०-१३. चतुःभक्ति- अरिहंत, आचार्य, बहुश्रुत और शास्त्र इन चारों में शुद्ध निष्ठापूर्वक अनुराग रखना । १४. आवश्यका परिहाणि - सामायिक आदि षड्आवश्यको के अनुष्ठान को भाव से न छोडना । १५. मोक्षमार्गप्रभावना -- अभिमान तजकर ज्ञानादि मोक्षमार्ग को जीवन में उतारना तथा दूसरों को उसका उपदेश देकर प्रभाव बढ़ाना | १६. प्रवचनवात्सल्य -- जैसे गाय बछडे पर स्नेह रखती है वैसे ही साधर्मियों पर निष्काम स्नेह रखना । २३ । नीच गोत्रकर्म के बन्धहेतु --- १. परनिन्दा -- दूसरों की निन्दा करना । निन्दा का अर्थ है सच्चे या झूठे दोषों को दुर्बुद्धिपूर्वक प्रकट करने की वृत्ति । २. आत्मप्रशंसा -- अपनी बडाई करना अर्थात् अपने सच्चे या झूठे गुणो को प्रकट करने की वृत्ति | ३. आच्छादन -- - दूसरे के गुणों को छिपाना और प्रसंग आने पर भी द्वेष से उन्हे न कहना । ४. उद्भावन -- अपने मे गुण न होने पर भी उनका प्रदर्शन करना अर्थात् निज के असद्गुणों का उद्भावन । २४ । उच्च गोत्रकर्म के बन्धहेतु -- १. आत्मनिन्दा -- अपने दोषो का अवलोकन । २. परप्रशंसा -- दूसरो के गुणों की सराहना । ३. असद्गुणोद्भावन -- अपने दुर्गुणों को प्रकट करना । ४. स्वगुणाच्छादन -- अपने विद्यमान गुणों को छिपाना । ५. नम्रवृत्ति -- पूज्य व्यक्तियों के प्रति विनम्रता । ६. अनुत्सेक -- ज्ञान, सम्पत्ति आदि मे दूसरे से अधिकता होने पर भी उसके कारण गर्व न करना । २५ । अन्तराय कर्म के बन्धहेतु -- किसी को दान देने मे या किसी को कुछ लेने मे अथवा किसी के भोग एवं उपभोग आदि मे बाधा डालना अथवा मन में वैसी वृत्ति पैदा करना विघ्नकरण है । २६ । साम्परायिक कर्मों के प्रसव के विषय में विशेष वक्तव्य --सूत्र ११ से २६ तक साम्परायिक कर्म की प्रत्येक मूल प्रकृति के भिन्न-भिन्न आस्रव या बन्धहेतु उपलक्षण मात्र है । अर्थात् प्रत्येक मूलप्रकृति के गिनाए गए आस्रवों के अतिरिक्त अन्य भी वैसे ही उन प्रकृतियों के आस्रव न कहने पर भी समझे जा Jain Education International For Private Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.008066
Book TitleTattvarthasutra Hindi
Original Sutra AuthorUmaswati, Umaswami
AuthorSukhlal Sanghavi
PublisherParshwanath Vidyapith
Publication Year1976
Total Pages444
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, Epistemology, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size9 MB
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