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________________ १४४ तत्त्वार्थ सूत्र [ ५. ३८-३९ चारित्र, वीर्य आदि परिमित गुण ही साधारणबुद्धि छद्मस्थ की कल्पना में आते है, सब गुण नही । इसी प्रकार पुद्गल के भी रूप-रस- गन्ध-स्पर्श आदि कुछ ही गुण कल्पना मे आते है, सब गुण नही । कारण यह है कि आत्मा या पुद्गल द्रव्य के समस्त पर्यायप्रवाहों को जानना विशिष्ट ज्ञान के बिना सम्भव नही । जो-जो पर्याय- प्रवाह साधारण बुद्धिगम्य है उनके कारणभूत गुणो का व्यवहार किया जाता है, इसलिए वे गुण विकल्प्य है । आत्मा के चेतना, आनन्द, चारित्र, वीर्य आदि गुण विकल्प्य अर्थात् विचार व वाणी के पुद्गल के रूप आदि गुण विकल्प्य है । शेष सब अविकल्प्य ज्ञानगम्य ही है । गोचर है और हैं जो केवल त्रिकालवर्ती अनन्त पर्यायों के एक-एक प्रवाह की कारणभूत ( गुण ) और ऐसी अनन्त शक्तियों का समुदाय द्रव्य है, यह सापेक्ष है । अभेददृष्टि से पर्याय अपने-अपने कारणभूत गुणस्वरूप स्वरूप होने से द्रव्य गुणपर्यायात्मक ही कहा जाता है । द्रव्य में सब गुण समान नही है । कुछ साधारण होते है अर्थात् सब द्रव्यों में पाये जाते है, जैसे अस्तित्व, प्रदेशत्व, ज्ञेयत्व आदि और कुछ असाधारण होते है अर्थात् एक-एक द्रव्य मे पाये जाते है जैसे चेतना, रूप आदि । असाधारण गुण और तज्जन्य पर्याय के कारण ही प्रत्येक द्रव्य एक-दूसरे से भिन्न है । धर्मास्तिकाय, अधर्मास्तिकाय और आकाशास्तिकाय द्रव्यों के गुण तथा पर्यायों का विचार भी इसी प्रकार करना चाहिए । यहाँ यह बात ज्ञातव्य है कि पुद्गल द्रव्य मूर्त है, अतः उसके गुण तथा पर्याय गुरु लघु कहे जाते है । परन्तु शेष सब द्रव्य अमूर्त है अतः उनके गुण और पर्याय अगुरुलघु कहे जाते है । ३७ । काल तथा उसके पर्याय १ कालश्चेत्येके । ३८ । सोऽनन्तसमयः । ३९ । कोई आचार्य काल को भी द्रव्य कहते हैं । वह अनन्त समयवाला है । Jain Education International १. दिगम्बर परम्परा मे 'कालश्च' सूत्रपाठ है । तदनुसार वहाँ काल को स्वतन्त्र द्रव्य माना गया है । वहाँ प्रस्तुत सूत्र को एकदेशीय मत-परक न मानकर सिद्धान्तरूप से ही काल को स्वतन्त्र द्रव्य मानने का सूत्रकार का तात्पर्य बतलाया गया है । जो काल को स्वतन्त्र द्रव्य नही मानते और जो मानते है वे सब अपने-अपने मन्तव्य की पुष्टि किस प्रकार करते है, काल का स्वरूप कैसा बतलाते है, इसमे और भी कितने मतभेद है। इत्यादि बातो को विशेष रूप से जानने के लिए देखे – हिन्दी चौथा कर्मग्रन्थ, कालविषयक परिशिष्ट, पृ० १५७ । एक-एक शक्ति कथन भी भेद और गुण द्रव्य For Private Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.008066
Book TitleTattvarthasutra Hindi
Original Sutra AuthorUmaswati, Umaswami
AuthorSukhlal Sanghavi
PublisherParshwanath Vidyapith
Publication Year1976
Total Pages444
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, Epistemology, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size9 MB
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