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________________ ४. ४५-५३] भवनपति, व्यन्तर तथा ज्योतिष्कों की स्थिति ११३ भवनपतियों की जघन्य स्थिति भवनेषु च । ४५ ॥ भवनपतियों की भी जघन्य स्थिति दस हजार वर्ष ही है। व्यन्तरों की स्थिति व्यन्तराणां च । ४६ । परा पल्योपमम् । ४७ ॥ व्यन्तर देवों की भी जघन्य स्थिति दस हजार वर्ष ही है। उत्कृष्ट स्थिति एक पल्योपम प्रमाण है । ४६-४७ । ज्योतिष्कों की स्थिति ज्योतिष्काणामधिकम् । ४८ । ग्रहाणामेकम् । ४९ । नक्षत्राणामर्धम् । ५०। तारकाणां चतुर्भागः । ५१। जघन्या त्वष्टभागः। ५२ ॥ चतुर्भागः शेषाणाम् । ५३ । ज्योतिष्क अर्थात् सूर्य व चन्द्र की उत्कृष्ट स्थिति कुछ अधिक एक पल्योपम प्रमाण है। ग्रहों की उत्कृष्ट स्थिति एक पल्योपम है। नक्षत्रों की उत्कृष्ट स्थिति अर्ध पल्योपम है । तारों को उत्कृष्ट स्थिति पल्योपम का चतुर्थाश है । जघन्य स्थिति पल्योपम का अष्टमांश है। शेष ज्योतिष्कों अर्थात् ग्रहों व नक्षत्रों की ( तारों को छोड़कर ) जघन्य स्थिति पल्योपम का चतुर्थांश है । ४८-५३ । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.008066
Book TitleTattvarthasutra Hindi
Original Sutra AuthorUmaswati, Umaswami
AuthorSukhlal Sanghavi
PublisherParshwanath Vidyapith
Publication Year1976
Total Pages444
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, Epistemology, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size9 MB
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