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________________ १०४ तत्त्वार्थसूत्र [४. २१-२२ सौधर्म, ऐशान आदि बारह कल्प (स्वर्ग) है। प्रथम सौधर्म कल्प ज्योतिश्चक्र के असख्यात योजन ऊपर मेरुपर्वत के दक्षिण भाग से उपलक्षित आकाशप्रदेश में स्थित है। उसके बहुत ऊपर किन्तु उत्तर की ओर ऐशान कल्प है । सौधर्म कल्प के बहुत ऊपर समश्रेणि में सानत्कुमार कल्प है और ऐशान के ऊपर समश्रेणि में माहेन्द्र कल्प है । इन दोनों के मध्य में किन्तु ऊपर ब्रह्मलोक कल्प है । इसके ऊपर समश्रेणि में क्रमशः लान्तक, महाशुक्र और सहस्रार ये तीन कल्प एक-दूसरे के ऊपर है । इनके ऊपर सौधर्म और ऐशान की तरह आनत और प्राणत ये दो कल्प है। इनके ऊपर समश्रेणि में सानत्कुमार और माहेन्द्र की तरह आरण और अच्युत कल्प है। कल्पों से ऊपर-ऊपर अनुक्रम से नौ विमान है जो पुरुषाकृति लोक के ग्रीवास्थानीय भाग मे होने से 'वेयक' कहलाते है । इनसे ऊपर-ऊपर विजय, वैजयन्त, जयन्त, अपराजित और सर्वार्थसिद्ध ये पाँच अनुत्तर विमान है । सबसे उत्तर (प्रधान ) होने के कारण ये 'अनुत्तर' कहलाते है। ___ सौधर्म कल्प से अच्युत कल्प तक के देव कल्पोपपन्न है और इनसे ऊपर के सभी देव कल्पातीत है । कल्पोपपन्न देवों में स्वामि-सेवकभाव होता है, कल्पातीत में नही । सभी कल्पातीत देव इन्द्रवत् होते है, अतः वे अहमिन्द्र कहलाते है। मनुष्यलोक में किसी निमित्त से आवागमन का कार्य कल्पोपपन्न देव ही करते है, कल्पातीत देव अपना स्थान छोड़कर कहीं नही जाते । २० । देवो की उत्तरोत्तर अधिकता और हीनता विषयक बातें स्थितिप्रभावसुखद्युतिलेश्याविशुद्धीन्द्रियावधिविषयतोऽधिकाः । २१ । गतिशरीरपरिग्रहाभिमानतो होनाः । २२ । स्थिति, प्रभाव, सुख, द्युति, लेश्याविशुद्धि, इन्द्रियविषय और अवधिविषय की ऊपर-ऊपर के देवों में अधिकता होती है । गति, शरीर, परिग्रह और अभिमान की ऊपर-ऊपर के देवों में हीनता होती है। नीचे-नीचे के देवों से ऊपर-ऊपर के देव सात बातों में अधिक ( बढे हुए) होते है। ये सात बाते निम्नलिखित है : १. स्थिति-इसका विशेष स्पष्टीकरण आगे सूत्र ३० से ५३ तक किया गया है। २. प्रमाव-निग्रह-अबुग्रह करने का सामर्थ्य, अणिमा-महिमा आदि सिद्धियों का सामर्थ्य और आक्रमण करके दूसरों से काम करवाने का बल यह सब प्रभाव के Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.008066
Book TitleTattvarthasutra Hindi
Original Sutra AuthorUmaswati, Umaswami
AuthorSukhlal Sanghavi
PublisherParshwanath Vidyapith
Publication Year1976
Total Pages444
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, Epistemology, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size9 MB
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