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________________ ८६ तत्त्वार्थसूत्र [ ३. १-६ _ लेश्या-रत्नप्रभा मे कापोत लेश्या है। शर्कराप्रभा मे भी कापोत है, पर रत्नप्रभा से अधिक तीव्रसंक्लेशकारी है। वालुकाप्रभा मे कापोत-नील लेश्या है । पङ्कप्रभा मे नील लेश्या है । धूमप्रभा मे नील-कृष्ण लेश्या है, तम.प्रभा में कृष्ण लेश्या है और महातम.प्रभा मे भी कृष्ण लेश्या है, पर तम.प्रभा से तीव्रतम है। परिणाम - वर्ण, गन्ध, रस, स्पर्श, शब्द, सस्थान आदि अनेक प्रकार के पौद्गलिक परिणाम सातो भूमियों मे उत्तरोत्तर अशुभ है। शरीर-सातो भूमियो के नारकों के शरीर अशुभ नामकर्म के उदय से उत्तरोत्तर अशुभ वर्ण, गन्ध, रस, स्पर्श, शब्द, संस्थानवाले तथा अशुचिपूर्ण और बीभत्स है। वेदना-सातो भूमियों के नारको की वेदना उत्तरोत्तर तोव है । पहली तीन भूमियों मे उष्ण वेदना, चौथी मे उष्ण-शीत, पाँचवी मे शीतोष्ण, छठी मे शीत और सातवी में शीततर वेदना है । यह उष्ण और शीत वेदना इतनी तीव्र है कि नारक जीव यदि मर्त्यलोक की भयंकर गरभी या ठण्ड में आ जाये तो उन्हे बड़े सुख को नीद आ सकती है। विक्रिया-उनकी विक्रिया भी उत्तरोत्तर अशुभ होती है । वे दुःख से घबरा कर छुटकारे के लिए प्रयत्न करते है, पर होता है उलटा । सुख के साधन जुटाने में उनको दु ख के साधन ही प्राप्त होते है। वे वैक्रियलब्धि से बनाने लगते है कुछ शुभ, किन्तु बन जाता है अशुभ ही । प्रश्न-लेश्या आदि अशुभतर भावो को नित्य कहने का प्रयोजन क्या है ? उत्तर-नित्य अर्थात् निरन्तर । गति, जाति, शरीर और अङ्गोपाङ्ग नामकर्म के उदय से नरकगति मे लेश्या आदि भाव जीवन-पर्यन्त अशुभ ही बने रहते है, बीच में एक पल का भी अन्तर नही पड़ता और न कभी वे शुभ ही होते है । ३ । एक तो नरक मे क्षेत्र-स्वभाव से सरदी-गरमी का भयंकर दुःख है ही,भूखप्यास का दुःख तो और भी भयंकर है । भूख इतनी सताती है कि अग्नि की भांति सर्व-भक्षण से भी शान्त नही होती, अपितु और भी बढती जाती है । प्यास इतनी लगती है कि चाहे जितना जल पिया जाय तो भी तृप्ति नही होती । इसके अतिरिक्त बड़ा भारी दु ख तो आपसी वैर और मारपीट का है । जैसे कौआ और उल्लू तथा सांप और नेवला जन्मजात शत्रु है, वैसे ही नारक जीव जन्मजात शत्रु होते है। इसलिए वे एक-दूसरे को देखकर कुत्तो की तरह आपस मे लडते है, काटते है और गुस्से से जलते है; इसीलिए वे परस्परजनित दु.खवाले कहे गए है । ४ । नारको मे तीन प्रकार को वेदना मानी गई है, जिनमे क्षेत्रस्वभावजन्य और Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.008066
Book TitleTattvarthasutra Hindi
Original Sutra AuthorUmaswati, Umaswami
AuthorSukhlal Sanghavi
PublisherParshwanath Vidyapith
Publication Year1976
Total Pages444
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, Epistemology, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size9 MB
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