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________________ तत्त्वार्थ सूत्र [ २. ३७-४९ पर निर्भर है। पुद्गलों में अनेक प्रकार के परिणमन की शक्ति होती है, अतः परिमाण में अल्प होने पर भी जब वे शिथिल रूप में परिणत होते है तब स्थूल कहलाते है और परिमाण मे बहुत होने पर भी जैसे-जैसे सघन होते जाते है वैसे-वैसे वे सूक्ष्म-सूक्ष्मतर कहलाते है । उदाहरणार्थ, भिडी की फली और हाथी के दाँत को ले | दोनों समान आकार के होने पर भी भिडी की रचना शिथिल होगी और दाँत की रचना ठोस । इस प्रकार परिमाण ( आकार ) तुल्य होने पर भी स्पष्ट है कि भिडी की अपेक्षा दाँत का पौद्गलिक द्रव्य अधिक है । ३८ | ७२ प्रारम्भक या उपादान द्रव्य का परिमारण - स्थूल सूक्ष्म भाव की उक्त व्याख्या के अनुसार उत्तर-उत्तर शरीर का आरम्भक द्रव्य पूर्व- पूर्व शरीर की अपेक्षा परिमाण मे अधिक होता है, यह बात स्पष्ट हो जाती है, पर वह परिमाण जितनाजितना पाया जाता है उसी को यहाँ दो सूत्रो मे बतलाया गया है । परमाणुओं से बने जिन स्कन्धों से शरीर निर्मित होता है वे ही स्कन्ध शरीर के आरम्भक द्रव्य है । जब तक परमाणु अलग-अलग हों तब तक उनसे शरीर नही बनता । परमाणुपुञ्ज, जो कि स्कन्ध कहलाते हैं, से ही शरीर बनता है । वे स्कन्ध भी अनन्त परमाणुओं के बने हुए होने चाहिए । औदारिक शरीर के आरम्भक स्कन्धों से वैक्रिय शरीर के आरम्भक स्कन्ध असंख्यात गुण होते है, अर्थात् औदारिक शरीर के आरम्भक स्कन्ध अनन्त परमाणुओं के होते है और वैक्रिय शरीर के आरम्भक स्कन्ध भी अनन्त परमाणुओं के; पर वैक्रिय शरीर के स्कन्धगत परमाणुओं की अनन्त संख्या औदारिक शरीर के स्कन्धगत परमाणुओं की अनन्त संख्या से असंख्यात - गुण अधिक होती है । यही अधिकता वैक्रिय और आहारक शरीर के स्कन्धगत परमाणुओ की अनन्त सख्या मे होती है । संख्या से तैजस के स्कन्धगत । आहारक स्कन्धगत परमाणुओं की अनन्त परमाणुओं की अनन्त संख्या अनन्तगुण होती है इसी तरह तैजस से कार्मण के स्कन्धगत परमाणु भी अनन्तगुण अधिक होते है । इस प्रकार यह स्पष्ट है कि पूर्व - पूर्व शरीर की अपेक्षा उत्तर-उत्तर शरीर का आरम्भक द्रव्य अधिक-अधिक होता है । फिर भी परिणमन की विचित्रता के कारण ही उत्तर-उत्तर शरीर निबिड, निबिडतर, निबिडतम बनता जाता है और सूव्म, सूक्ष्मतर, सूक्ष्मतम कहलाता है । प्रश्न- जब औदारिक के स्कन्ध भी अनन्त परमाणुवाले और वैक्रिय आदि के स्कन्ध भी अनन्त परमाणुवाले है, तो फिर उन स्कन्धो में न्यूनाधिकता कैसे समझी जाय ? उत्तर—अनन्त संख्या अनन्त प्रकार की है । इसलिए अनन्त रूप मे समानता Jain Education International For Private Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.008066
Book TitleTattvarthasutra Hindi
Original Sutra AuthorUmaswati, Umaswami
AuthorSukhlal Sanghavi
PublisherParshwanath Vidyapith
Publication Year1976
Total Pages444
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, Epistemology, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size9 MB
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