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________________ १. ३४-३५ ] नय के भेद ३५ और उनका यथार्थ निर्णय करनेवाले सभी सम्यग्दृष्टि है । इसलिए प्रश्न उठता है कि अध्यात्मशास्त्र के पूर्वोक्त ज्ञान-अज्ञान सम्बन्धी संकेत का आधार क्या है ? उत्तर - अध्यात्मशास्त्र का आधार आध्यात्मिक दृष्टि है, लौकिक दृष्टि नहीं । जीव दो प्रकार के है -- मोक्षाभिमुख और ससाराभिमुख । मोक्षाभिमुख जीव या आत्मा में समभाव और आत्मविवेक होता है, इसलिए वे अपने सभी ज्ञानों का उपयोग समभाव की पुष्टि मे करते है, सासारिक वासना की पुष्टि मे नही । लौकिक दृष्टि से उनका ज्ञान चाहे अल्प ही हो पर उसे ज्ञान कहा जाता है । संसाराभिमुख आत्मा का ज्ञान लौकिक दृष्टि से कितना ही विशाल और स्पष्ट हो, वह समभाव का पोपक न होने से जितने परिमाण में सांसारिक वासना का पोषक होता है उतना अज्ञान कहलाता है । जैसे उन्मत्त मनुष्य भी सोने को सोना और लोहे को लोहा जानकर कभी यथार्थ ज्ञान प्राप्त कर लेता है, पर उन्माद के कारण वह सत्य-असत्य का अन्तर जानने में असमर्थ होता है । इसलिए उसका सच्चाझूठा सम्पूर्ण ज्ञान विचारशून्य या अज्ञान ही कहलाता है । वैसे ही संसाराभिमुख आत्मा को कितना ही अधिक ज्ञान हो, पर आत्मा के विषय में अंधेरा होने के कारण उसका सम्पूर्ण लौकिक ज्ञान आध्यात्मिक दृष्टि से अज्ञान ही है । सारांश, उन्मत्त मनुष्य के अधिक विभूति भी हो जाय और कभी वस्तु का यथार्थ बोध भी हो जाय तथापि उसका उन्माद ही बढता है, वैसे ही मिथ्यादृष्टि आत्मा, जिसके राग-द्वेष की तीव्रता और आत्मा का अज्ञान होता है, वह अपनी विशाल ज्ञानराशि का भी उपयोग केवल सांसारिक वासना के पोषण में ही करता है । इसीलिए उसके ज्ञान को अज्ञान कहा जाता है । इसके विपरीत सम्यग्दृष्टि आत्मा, जिसमें राग-द्वेष की तीव्रता न हो और आत्मज्ञान हो, वह अपने अल्प लौकिक ज्ञान का उपयोग भी आत्मिक तृप्ति मे करता है । इसलिए उसके ज्ञान को ज्ञान कहा गया है । यह आध्यात्मिक दृष्टि है । ३२-३३ । नय के भेद नैगमसङ्ग्रह्व्यवहारर्जसूत्रशब्दा नयाः । ३४ । आद्यशब्दौ द्वित्रिभेदौ । ३५ । नैगम, संग्रह, व्यवहार, ऋजुसूत्र और शब्द ये पाँच नय हैं । आद्य अर्थात् प्रथम नैगम नय के दो और शब्द नय के तीन भेद है । नय के भेदों की संख्या के विषय में कोई एक निश्चित परम्परा नही है । इनकी तीन परम्पराएँ देखने में आती है । एक परम्परा तो सीधे तौर पर पहले से ही सात भेदों को मानती है, जैसे नैगम, संग्रह, व्यवहार, ऋजुसूत्र, शब्द, Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.008066
Book TitleTattvarthasutra Hindi
Original Sutra AuthorUmaswati, Umaswami
AuthorSukhlal Sanghavi
PublisherParshwanath Vidyapith
Publication Year1976
Total Pages444
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, Epistemology, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size9 MB
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