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________________ १४ तत्त्वार्थ सूत्र [ १. १४ और वर्तमान उभय-विषयक है । चिन्ता भावी वस्तु की विचारणा ( चिन्तन ) है, इसलिए वह अनागत-विषयक है । प्रश्न- इस कथन से तो मति, स्मृति, संज्ञा और चिन्ता ये पर्यायवाची शब्द नही हो सकते, क्योकि इनके अर्थ भिन्न-भिन्न है ? उत्तर - विषय-भेद और कुछ निमित्त भेद होने पर भी मति, स्मृति, संज्ञा और चिन्ता ज्ञान का अन्तरङ्ग कारण जो मतिज्ञानावरणीय कर्म का क्षयोपशम है वही सामान्य रूप से यहाँ विवक्षित है; इसी अभिप्राय से यहाँ मति आदि शब्दों को पर्यायवाची कहा गया है । प्रश्न- - अभिनिबोध शब्द के विषय मे तो कुछ नही कहा गया । वह किस प्रकार के ज्ञान का वाचक है ? उत्तर- अभिनिबोध मतिज्ञानबोधक एक सामान्य शब्द है । वह मति, स्मृति, संज्ञा और चिन्ता इन सभी ज्ञानों के लिए प्रयुक्त होता है अर्थात् मति-ज्ञानावरणीय कर्म के क्षयोपशम से होनेवाले सब प्रकार के ज्ञानों के लिए अभिनिबोध शब्द सामान्य रूप में व्यवहृत होता है और मति आदि शब्द उस क्षयोपशमजन्य खास-खास ज्ञानों के लिए है । प्रश्न - इस तरह तो अभिनिबोध सामान्य शब्द हुआ और मति आदि उसके विशेष शब्द हुए, फिर ये पर्यायवाची शब्द कैसे ? उत्तर - यहाँ सामान्य और विशेष की भेद-विवक्षा न करके सबको पर्यायवाची शब्द कहा गया है । १३ । मतिज्ञान का स्वरूप तदिन्द्रियाऽनिन्द्रियनिमित्तम् । १४ । प्रश्न - मतिज्ञान इन्द्रिय और अनिन्द्रिय के निमित्त से उत्पन्न होता है । - यहाँ मतिज्ञान के इन्द्रिय और अनिन्द्रिय ये दो कारण बतलाये गये है । इनमे चक्षु आदि इन्द्रिय तो प्रसिद्ध है, पर अनिन्द्रिय से क्या अभिप्राय है ? उसर - अनिन्द्रिय अर्थात् मन । प्रश्न- जब चक्षु आदि तथा मन ये सभी मतिज्ञान के साधन है तब एक को इन्द्रिय और दूसरे को अनिन्द्रिय कहने का कारण ? उत्तर - चक्षु आदि बाह्य साधन है और मन आभ्यन्तर साधन है । यही भेद इन्द्रिय और अनिन्द्रिय संज्ञाभेद का कारण है । १४ । Jain Education International For Private Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.008066
Book TitleTattvarthasutra Hindi
Original Sutra AuthorUmaswati, Umaswami
AuthorSukhlal Sanghavi
PublisherParshwanath Vidyapith
Publication Year1976
Total Pages444
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, Epistemology, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size9 MB
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