SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 151
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ - १२४ - नाणोः ॥११॥ लोकाकाशेऽवगाहः ॥ १२ ॥ धिर्मयोः कृत्स्ने ॥ १३॥ एकप्रदेशादिषु भाज्यः पुद्गलानाम् ॥ १४ ॥ असङ्ख्ययभागादिषु जीवानाम् ॥ १५ ॥ प्रदेशसंहारविसर्गोभ्यां प्रदीपवत् ॥ १६ ॥ गतिस्थित्युपग्रहो धर्माधर्मयोरुपकारः ॥१७॥ आकाशस्यावगाहः ॥१८॥ शरीरवाङ्मनःप्राणापानाः पुद्गलानाम् ॥ १९ ॥ सुखदुःखजीवितमरणोपग्रहाश्च ॥ २० ॥ परस्परोपग्रहो जीवानाम् ॥ २१ ॥ वर्तना परिणामः क्रिया परत्वापरत्वे च कालस्य ॥ २२॥ स्पर्शरसगन्धवर्णवन्तः पुद्गलाः ॥२३॥ शब्दबन्धसौक्षम्यस्थौल्यसंस्थानभेदतमश्छायाऽऽतपोद्योतवन्तश्च ॥२४॥ अणवः स्कन्धाश्च ॥ २५ ॥ सङ्कातभेदेभ्यं उत्पद्यन्ते ॥२६॥ भेदादणुः ॥ २७॥ भेदसङ्घाताभ्यां चाक्षुषोः ॥ २८॥ उत्पादव्ययध्रौव्ययुक्तं सत् ॥ २९ ॥ तद्भावाव्ययं नित्यम् ॥ ३० ॥ १. -विसर्पा-स० रा० श्लो० । २. -पग्रहो-सि० स० रा० श्लो० । अकलंक ने द्विवचन का समर्थन किया है । देखे--विवेवन, पृ० १२३, टि० १ । ३. वर्तनापरिणामक्रियाः पर-स० । वर्तनापरिणामक्रिया पर-रा० । ४. भेदसंघातेभ्य उ-स० रा० श्लो० । ५. -चाक्षुषः-स० रा० श्लो० । सिद्धसेन इस सूत्र के अर्थ मे किसी का मतभेद बतलाते है । ६. इस सूत्र से पहले स० और श्लो० मे सद द्रव्यलक्षणम् सूत्र है। लेकिन राल मे ऐसा अलग सूत्र नहीं है, उसमे तो यह बात उत्थानिका में ही कही गई है । भाष्य में इसका भावकथन है। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.008066
Book TitleTattvarthasutra Hindi
Original Sutra AuthorUmaswati, Umaswami
AuthorSukhlal Sanghavi
PublisherParshwanath Vidyapith
Publication Year1976
Total Pages444
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, Epistemology, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size9 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy