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________________ - १२१ - औपपातिकमनुष्येभ्यः शेषास्तिर्यग्योनयः॥२८॥ स्थितिः ॥ २९ ॥ भवनेषु दक्षिणार्धाधिपतीनां पल्योपममध्यर्धम् ॥ ३०॥ शेषाणां पादोने ॥३१॥ असुरेन्द्रयोः सागरोपममधिकं च ॥ ३२॥ सौधर्मादिषु यथाक्रमम् ॥ ३३ ॥ सागरोपमे ॥ ३४॥ अधिके च ॥ ३५ ॥ सप्त सानत्कुमारे ॥३६॥ विशेषत्रिसप्तदशैकादशत्रयोदशपञ्चदशभिरधिकानि च ॥३७॥ आरणाच्युतादूर्ध्वमेकैकेन नवसु ग्रैवेयकेषु विजयादिषु सर्वार्थसिद्धे च ॥३८॥ अपरा पल्योपममधिकं च ॥ ३९ ॥ सागरोपमे ॥४०॥ अधिके च ॥४१॥ परतः परतः पूर्वा पूर्वाऽनन्तरा॥४२॥ नारकाणां च द्वितीयादिषु ॥४३॥ दशवर्षसहस्राणि प्रथमायाम् ॥४४॥ भवनेषु च ॥ ४५ ॥ व्यन्तराणां च ॥४६॥ १. -पादिक-स० रा० श्लो० । २. इस सूत्र से ३२ वें सूत्र तक के लिए स्थितिरसुरनागसुपर्णद्वीपशेषाणां सागरोपमत्रिपल्योपमार्द्धहीनमिता-यह एक ही सूत्र स० रा० श्लो० में है । श्वे० दि० दोनों परंपराओं मे भवनपति की उत्कृष्ट स्थिति के विषय में मतभेद है। ३. इस सूत्र से ३५वे सूत्र तक के लिए एक ही सूत्र सौधर्मेशानयो. सागरोपमे अधिके च स० रा० श्लो० में है। दोनों परंपराओं मे स्थिति के परिमाण में भी अन्तर है । देखें-प्रस्तुत सूत्रों की टीकाएँ। ४. सानत्कुमारमाहेन्द्रयोः सप्त-स० रा० श्लो० । ५. त्रिसप्तनवैकादशपंचदशभिरधिकानि तु-स० रा० श्लो० । ६. सिद्धौ च-स०रा० श्लो० । ७. यह और इसके बाद का सूत्र स० रा० श्लो० में नही है । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.008066
Book TitleTattvarthasutra Hindi
Original Sutra AuthorUmaswati, Umaswami
AuthorSukhlal Sanghavi
PublisherParshwanath Vidyapith
Publication Year1976
Total Pages444
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, Epistemology, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size9 MB
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