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________________ विचारमाला. .. वि०४: पदका अर्थ है, समीप देश औ वर्तमानकालसहित देवदत्तशरीर यह पदका अर्थ है; अतीतकालसहित अन्यदेशसहित जो वस्तु सोई वर्तमानकाल औ समीपदेशसहित है, यह समुदायका वाच्य अर्थ है, सो संभव नहीं: काहेते अतीतकाल औ वर्तमानकालका विरोध है, तथा अन्यदेशका औ समीपदेशका विरोध है, याते. परोक्षदेश अतीतकालरूप एक भागका त्याग करके एक भाग देवदत्त शरीरमात्रमै सो पदकी लक्षणा औ समीपदेश औ वर्तमानकालरूप एक भाग त्याग करके, एक भाग देवदत्त शरीरमात्रमें यह पदकी लक्षणा है। या रीतिसे लक्षणाके तीन भेद हैं। तिनमेंसे महावाक्यमें जहती अजहती संभव नहीं औ भागत्याग या रीतिसे हैः-पूर्वोक्त वाक्यार्थके विरोधते तत्पदके वाच्यमें जो माया औ मायाकृत सर्वशक्ति सर्वज्ञता आदि धर्म, इतने वाच्य भागकू त्यागके, चेतनभागविषै तत्पदकी भागत्याग लक्षणा है । तैसे त्वंपदके वाच्यमें जो अविद्या अंश औ अविद्याकृत अल्पशक्ति अल्पज्ञता आदिधर्म,ताईं.
SR No.007743
Book TitleVicharmala Granth Satik Pustak 1 to 8
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnathdas Sadhu, Govinddas Sadhu
PublisherGujarati Chapkhana
Publication Year1832
Total Pages194
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size5 MB
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