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________________ ३३८ तत्त्वार्थसूत्रे उक्तञ्च प्रज्ञापनायां १३ परिणामपदे १८१ सूत्रे-“दुविहे परिणामे पण्णत्ते, तं जहा जीवपरिणामे य, अजीवपरिणामे य-" इति । द्विविधः परिणामः प्रज्ञप्तः, तद्यथा--जीवपरिणामश्च, अजीवपरिणामश्वेति ॥३१॥ इति श्री विश्वविख्यात जगद्वल्लभ-प्रसिद्धवाचक - पञ्चदश भाषा कलितललितकलापालापक प्रविशुद्धगद्यपद्यानैकग्रन्थनिर्मापक शाहुच्छत्रपति कोल्हापुर राजप्रदत्त जैनशास्त्राचार्य जैनधर्मदिवाकर पूज्य श्री घासीलाल वतिविरचितस्य दीपिका नियुक्ति टीकाद्वयोपतेस्य तत्वार्थसूत्रस्य द्वितीयमध्ययननं __समाप्तम् ॥२॥ प्रज्ञापनासूत्र के तेरह वें परिणाम पद के १८१ वें सूत्र में कहा है'परिणाम दो प्रकार का कहा है; वह इस प्रकार है-जीवपरिणाम और अजीवपरिणाम ॥३१॥ श्री जैन शास्त्राचार्य जैन धर्मदिवाकर पूज्य श्री घासीलाल जी महाराज विरचित तत्वार्थसूत्र की दीपिका एवं नियुक्ति नामक व्याख्या का दूसरा अध्ययन समाप्त ॥२॥ શ્રી તત્વાર્થ સૂત્ર: ૧
SR No.006385
Book TitleTattvartha Sutra Part 01 Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGhasilal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1973
Total Pages1032
LanguageSanskrit, Hindi, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Agam, & Canon
File Size60 MB
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