SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 148
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ १३६ उत्तराध्ययन सूत्रे टीका -- 'मायाबुइय' इत्यादि । हे संजय मुने । क्रियावाद्यादिभिर्यत्मरूपितम् एतत्सर्वं तु मायोक्तम् = मायाभाषितम् । तथा क्रियावादिप्रभृतीनां भाषा = उक्तिः मृषा अलीका, निरर्थिका = शिवसुखवर्जिता चास्ति । तत एवाई संयच्छन्नपि = क्रियावाद्यादिमतश्रवणादिभ्यो निवर्तमान एव, अपिशब्दो निश्वयार्थकः, वसामि - तिष्ठामि स्वात्मनीति शेषः । इदं हि संजयमुनेः स्थिरिकरणार्थमुक्तम् । अयं भाव: यथाऽहं क्रियावाद्याद्यसत्प्ररूपणातो निरृत्तस्तथा त्वयाऽपि निवर्त्तितव्यमिति । उक्तंचापि – “ठियो य ठाव परं " छाया-स्थितच स्थायष्यति परम् इति । च पुनरहम् ईरे = संयममार्गे विचरामि ||२६|| ये क्रियावादी आदि पापकारी कैसे हैं ? इस बातको क्षत्रिय राजऋषि प्रदर्शित करते हैं— 'मायाबुइय' इत्यादि । अन्वयार्थ - हे संजयमुने । क्रियावादी आदि जनों द्वारा जो कुछ भी प्ररूपित किया गया है (एयं - एतत्) यह सब ( माया बुइयम्- -मायोतम् ) माया से ही कहा गया है तथा (मुसा भासा निरन्थिया - मृषा भाषा निरर्थका) इसकी भाषा-वाणी - मृषा - सर्वथा अलीक है और निरर्थक - शिवसुख से जीवों को वर्जित करनेवाली है। इसीलिये (अहं संजममाणोवि अहं संयच्छन्नपि ) मैं क्रियावादी आदि के मतके श्रवण आदि से दूर होकर निश्चय से ( वसामि - वसामि) अपनी आत्मा में वसता हूं, यह बात संजयमुनि की स्थिरता के निमित्त ही क्षत्रिय राजऋषिने कही है। तात्पर्य इसका यह है कि जिस प्रकार मैं क्रियावादी आदि की असत्प्ररूपणा से परे रहता हूं उसी तरह से आपको भी दूर रहना चाहिये । कहा भी है- "ठिओ ये ठावए परं" जो स्वयं स्थित એ ક્રિયાવાદી આદિ પાપકારી કેવા છે? આ વાતને ક્ષત્રિય રાજષિ પ્રદશિત ५२ छे. - "माया बुझ्य" ४त्याहि ! અન્નયા હૈં સંજય મુનિ ! ક્રિયાવાદી આદિજના દ્વારા જે કઇ પણ પ્રરૂપિત ४२वामां यावेस छे एयं- एतत् ते सणु माया बुइयम् - मायोक्तम् भायार्थी उहेबामां आवे छे. तथा मुसाभासा निरत्थिया - मृषाभाषा निरर्थिका मेनी ભાષા, વાણી, મૃષા, સર્વથા અલૌક છે. અને નિરથ ક શિવસુખથી જીવાને વત ४२वाबाजी छे. या अरखे हुं अहं संजममाणो वि-अहं संयच्छन्नपि डियावाही माहिना भतने सांभणवाथी दूर रहीने निश्चयथी वसामि वसामि पोताना आत्मामां વસું છું. આ વાત સંજય મુનિની સ્થિરતાના માટે જ ક્ષત્રિય રાષિએ કહેલ છે. તાપ' આનું એ છે કે, જે પ્રકારે હું ક્રિયાવાદી આદિની અસત્ પ્રરૂપણાથી દૂર रहुँ छु न प्रमाणे तमारे या दूर रहेवु लेहा उधुपगु छे- “ठीओ य ઉત્તરાધ્યયન સૂત્ર : ૩
SR No.006371
Book TitleAgam 30 Mool 03 Uttaradhyayana Sutra Part 03 Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGhasilal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1961
Total Pages1051
LanguageSanskrit, Hindi, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, & agam_uttaradhyayan
File Size58 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy