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________________ प्रियदर्शिनी टीका. अ० २ गा० १७ स्त्रीपरीषहजये लावण्यपूरमुनिदृष्टान्तः ३९३ टीका-'एवमादाय ' इत्यादि । स्त्रियः पङ्कभूताः कर्दमतुल्या एव सन्ति, मोक्षमार्गे विचरतां विघ्नकारकस्वाद् , मालिन्यजनकत्वाच्च, अत्र तु-शब्दोऽवधारणार्थकः, एवम्-ईदृशं प्रवचनरहस्यमर्थम् , आदाय गृहीत्वा बुद्धया निश्चित्येत्यर्थः । मेधावी-चारित्रमर्यादावर्ती, ताभिः स्त्रीभिः, नो नैव विनिहन्यात् , आत्मानं संयमरूपजीवितोपघातेन न नरकादिषु पातयेदित्यर्थः, किं तु आत्मगवेषकः-आत्मानमेव गवेषयतीत्यात्मगवेषकः, 'आत्मा केनोपायेन संसारसागरतस्तारणीयः, इत्येवमात्मकल्याणचिन्तनपरः सन् , चरेत् ब्रह्मचर्यधर्मारामे विहरेदित्यर्थः।। ___ अन्वयार्थ-(इथिओ पंकभूयाउ-स्त्रियः पंकभूताः) ये स्त्रियां कर्दम तुल्य ही हैं, क्यों कि मोक्षमार्ग में विचरण करने वाली आत्माओं को ये सदा से विघ्नकारक होती हैं, तथा इनसे पुरुषों में रागरूप मलिनता उत्पन्न होती है (एवमादाय मेहावी-एवमादाय मेधावी) इस प्रकार प्रवचन के रहस्यभूत अर्थ का अपनी हिताहितविवेचक धुद्धि से निश्चय कर चारित्र की मर्यादा में रहने वाला मुनि (ताहिं नो विणिहन्नेज्जा-ताभिः नो विनिहन्यात् ) स्त्रियों द्वारा अपने संयमरूप जीवन के विनाश से अपने आपको नरकादिक योनियों में नहीं गिरावे किन्तु (अत्तगवेसए चरेज्ज-आत्मगवेषकः चरेत् ) " आत्मा किस उपाय से इस संसार सागर से पार हो" इस प्रकार आत्मकल्याण की चिन्तना में तत्पर होता हुआ वह ब्रह्मचर्यरूप आराम-उद्यान में ही विचरण करता रहे। मन्वयार्थ–इथिओ पंकभूया उ-स्त्रियः पंकभूताः ॥ स्निया ४४१ तुक्ष्य छ, કારણ કે મોક્ષ માર્ગમાં વિચરનારા આત્માઓને એ સદા વિનકારક થાય છે. भने तनाथी पुरुषोमा २।१३५ मसिनता उत्पन्न थाय छे. एवमदाय मेहावी-एवमादाय મેધાવી આ પ્રકારે પ્રવચનના રહસ્યભૂત અર્થને પિતાના હિતાહિત વિવેચક भुद्धिथी निश्चय ४३ यास्त्रिनी भामा २२वा मुनि ताहिं नो विणिहन्नेज्जा -ताभिः नो विनिहन्यात् श्रियो द्वारा थती पाताना सयभ३५ अपना विनाशथी पोते पाताने नहि योनिमामा न as onय. परंतु अत्तगवेसए चरेज-आत्मगवेषकः चरेत् “मात्मा ज्या पायथी मा संसार सागरने तरी जय" या પ્રકારની આત્મકલ્યાણની ચિંતનામાં તત્પર રહીને તે બ્રહ્મચર્યરૂપ આરામ ઉદ્યાનમાં જ વિચરણ કરતા રહે. उ० ५० ઉત્તરાધ્યયન સૂત્ર : ૧
SR No.006369
Book TitleAgam 30 Mool 03 Uttaradhyayana Sutra Part 01 Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGhasilal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1959
Total Pages855
LanguageSanskrit, Hindi, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, & agam_uttaradhyayan
File Size45 MB
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