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________________ प्रमेयोधनी टीका पद २५ सू० १ कर्मप्रकृति वेदनिरूपणम् ४९१ अथ बहुत्वमधिकृत्य गौतमः पृच्छति - 'जीवा णं भंते ! वेयणिज्जं कम्मं बंधमाणा कइ कम्मपगडीओ वेदेति ?' हे भदन्त ! जीवाः खलु वेदनीयं कर्म बध्नन्तः कति कर्मप्रकृती वेदयन्ते ? भगवानाह - 'गोयमा !' हे गौतम ! ' सव्वे वि ताव होज्जा अट्ठविहवेयगा यचविवेगा ?' सर्वेऽपि तावद् जीवाः भवेयुः अष्टविधवेदकाथ चतुर्विधवेदकाश्च १, 'अहवा अविवेगा यचविहवेयगा य सत्तविहवेयगे य २' अथवा बहवोऽष्टविधवेदकाथ चतुविवेदका भवन्ति एकः पुनः सप्तविधवेदकश्च भवति २, 'अहवा अट्ठविहवेयगा य चउब्बिह गाय सत्तविवेगा य३' अथवा बहवो जीवा अष्टविधवेदकाश्च चतुर्विधवेदकाश्च सप्त विधवेदकाश्च भवन्ति, ' एवं मणूसा वि भाणियव्या' एवम् समुच्चय जीवोक्तरीत्या मनुष्या अपि वेदनीयंकर्म बघ्नन्तो भणितव्याः वक्तव्याः तथा च सर्वेऽपि तावद् भवेयुरष्टविधवेदकाथ चतुर्विधवेदकाच अथवा बहवोऽष्टावेध वेदकाश्च चतुर्विधवेदकाश्च भवन्ति कश्चित्पुनरेको मनुष्यः सप्तविधवेदकश्च भवति २, अथवा अष्टविश्वेदकाश्च चतुर्विधवेदकाच सप्तविधवेदकाश्च ३ इति भावः । ' पण्णत्रणाए भगवईए कम्पवेद णामं पणवीसइमं पर्य समत्तं' प्रज्ञापनायां भगवत्यां कर्मवेदनाम पञ्चविंशतितमं पदं समाप्तम् ॥ स ० १-२५ ॥ वेदनीयकर्म को बांधते हुए कितनी कर्मप्रकृतियों का वेदन करते हैं ? भगवान् - हे गौतम! सभी जीव आठ के वेदक और चार के वेदक होते हैं, अथवा बहुत जीव आठ के वेदक एव बहुत चार के वेदक होते हैं और एक कोई सात का वेदक होता है । अथवा बहुत से आठ के वेदक होते हैं, बहुत से चार के वेदक होते हैं और बहुत से सात के वेदक होते हैं । इसी प्रकार बहुत मनुष्यों के विषय में भी कह लेना चाहिए, अर्थात् बहुत मनुष्य भी बेदनीयकर्म का बन्ध करते हुए आठ के वेदक और चार के वेदक, अथवा बहुत से आठ के वेदक, बहुत से चार के वेदक और एक कोई सात का वेदक. अथवा बहुत आठ के वेदक, बहुत चार के वेदक और बहुत सात के वेदक होते हैं । सू० १ पच्चीसवां पद समाप्त ॥ २५ ॥ વેદીયકને બાંધતા થકા કેટલી કમ પ્રકૃતિયાનુ વેદન કરે છે ? શ્રીભગવાન્-હે ગૌતમ ! બધા જીવ માઠના વેક અને ચારના વેદક હોય છે, અથવા ઘણા જીવ આઠના વેદક તેમજ ઘણા ચારના વેદક હેાય છે અને એક કેાઈ સાતના વૈદક થાય છે. અથવા ઘણા આઠના વેક બને છે. ઘણા ચારના વૈદક થાય છે અને ઘણા સાતના વેદક છે. એજ પ્રકારે ઘણા મનુષ્યના વિષયમાં પણ કહેવું જોઇએ અર્થાત્ ઘણા મનુષ્ય પશુ વેદનીયકમના મધ કરતાં થકા આઠના વૈદક અને ચારના વૈદક, અથવા ઘણા આઠના વૈદક, ઘણા ચારના વેદક અને કેઇ એક સાતના વેક અથવા ઘણા આઠના વેદક, ઘણા ચારના વૈદક અને ઘણા સાતના વેદક થાય છે. સૂ૦૧૫ પચ્ચીસમુ' પદ સમાપ્ત ॥ ૨૫ ગ્રા શ્રી પ્રજ્ઞાપના સૂત્ર : ૫
SR No.006350
Book TitleAgam 15 Upang 04 Pragnapana Sutra Part 05 Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGhasilal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1980
Total Pages1173
LanguageSanskrit, Hindi, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, & agam_pragyapana
File Size76 MB
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