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________________ ५६६ प्रज्ञापनामुळे __टीका-अथ पूर्वोक्तक्रोधादीनां निर्वृतिभेदादयस्थाभेदाच भेदान प्ररूपयितुमाह-'कइविहे णं भंते ! कोहे पण्णत्ते ?' गौतमः पृच्छति-हे भदन्त ! कतिविधः खलु क्रोधः प्रज्ञप्तः? भगवानाह-गोयमा !' हे गौतम ! 'चउच्चिहे कोहे षण्णत्ते' चतुर्विधः क्रोधः प्रज्ञप्तः, 'तं जहा-आभोगनिव्वत्तिए' तद्यथा-आभोगनिवर्तितः 'अणाभोगनिव्वत्तिए' अनाभोगनिर्वर्तितः, 'उवसंते, अणुवसंते' उपशान्तः, अनुपशान्तश्च, तत्र यदा परस्यापराधं बुद्ध्वा क्रोधहेतुश्च व्य. वहारेण पुष्टमवलम्ब्य प्रकारान्तरेणास्य शिक्षा न सम्भवतीति आभोग्य-विचार्य क्रोधं करोति तदा स क्रोधः आभोगनिवर्तितः उच्यते यदा तु साधारणत एव तथाविधमोहवशाद् गुणदोष(अट्ठारस दंडगा) अठारह दंडक (जाव वेमाणिया) वैमानिकों तक (निजरिंसु, निजाति, निजरिस्संति) निर्जरा की, निर्जरा करते हैं, निर्जरा करेंगे __ (आयपतिट्टिय) आत्मप्रतिष्ठित (खेतं पडुच्च) क्षेत्र के आश्रय से (अणंताणुबंधि) अनन्तानुबंधी (आभोगे) उपयोग (चिण-उवचिण-बंध-उदीर-चेद) (चय, उपचय, बंध, उदीरणा, वेदना (तह निज्जरा) तथा निर्जरा (चेय) और कषाय पद समाप्त टीकार्थ -अब निवृत्ति के भेद से तथा अवस्था के भेद से होने पाले क्रोधादि के भेदों की प्ररूपणा की जाती है गौतम स्वामी प्रश्न करते हैं-हे भनवन् ! क्रोध कितने प्रकार का कहा है ? भगवान्-हे गौतम ! क्रोध चार प्रकार का कहा है, यथा-आभोगनिर्वर्तित, अनाभोगनिर्तित, उपशान्त और अनुपशान्त । जब दूसरे के अपराध को जानकर और क्रोध के पुष्ट कारण का अवलम्बन करके, प्रकारान्तर से इसे शिक्षा नहीं मिल सकती, ऐसा:विचार करके क्रोध करता है, तब वह क्रोध सुधी (निजरि सु निज्जरे ति, निजरिस्संति) नि२३ ४२, नि । ४३ छ, न २ ५२ (आयपतिट्रिय) माम प्रतिहत (खेत्तं पडुच्च) क्षेत्रना माश्रयथी (अणंताणुबंधि) मनन्तानुमची (आभोगे) योग (चिण-उवचिण-बंध-उदीर-वेद) यय, ७५यय, 14 मही२, वेहन (तह निज्जरा) तथा नि । (चेव) मने કષાય પદ સમાપ્ત ટીકાર્થ-હવે નિવૃત્તિના ભેદથી તથા અવસ્થાના ભેદથી થનારા ક્રોધાદિના ભેદની પ્રરૂપણ કરાય છે શ્રી ગૌતમસ્વામી પ્રશ્ન કરે છે. હે ભગવન્! ક્રોધ કેટલા પ્રકારના કહ્યા છે? શ્રી ભગવાન્ –હ ગતમ! કોઈ ચાર પ્રકારના કહ્યા છે, જેમકે, આભેગનિવર્તિત, અનાગનિવર્તિત, ઉપશાત અને અનુપશાન. જ્યારે બીજાના અપરાધને જાણીને અને ક્રોધના પુષ્ટકરણનું અવલંબન કરોને, પ્રકારત્તરથી એને શિક્ષા નથી મળી શક્તી, એ વિચાર કરીને ક્રોધ કરે છે, ત્યારે તે ક્રોધ આભેગનિવર્તિત અર્થાત જાણુ વિચારથી ઉત્પન્ન ક્રોધ શ્રી પ્રજ્ઞાપના સૂત્ર : ૩
SR No.006348
Book TitleAgam 15 Upang 04 Pragnapana Sutra Part 03 Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGhasilal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1977
Total Pages955
LanguageSanskrit, Hindi, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, & agam_pragyapana
File Size62 MB
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