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________________ १५० प्रज्ञापनासूत्रे द्विप्रदेशावगाढ द्विप्रदेशिकस्कन्धवच्चरमः द्वौ चाधस्तनौ परमाणू चरम इति ते चत्वारश्चरमौ इति, एकश्च केवल परमाणूवच्चरमाचरमशब्दाभ्यामवक्तव्यो भवति, इति तत्समुद्रायात्मकः पञ्चप्रदेशिक स्कन्धोऽपि 'चरमौ चावक्तव्यश्च' इति व्यपदिश्यते, 'नो चरमाई य अवत्तव्ययाई य १४' पञ्चप्रदेशिकः स्कन्धो नो 'चरमाणि च अवक्तव्यानि च' इति व्यपदिश्यते, प्रागुक्तयुक्तेः, 'नो अचरमे य अवत्तव्वए य १५' नो 'अचरमश्चावक्तव्यश्च' इति व्यपदिश्यते, प्रागुक्तयुक्तेरेव, 'नो अचरमे य अवत्तव्वयाइं य १६' नो 'अचरमश्चावक्तव्यानि च इति व्यपदिश्यते, 'नो अचरमाई य अवत्तव्वए य १७ नो अचरमाणि च अवक्तव्यश्च' इति वा व्यपदिश्यते, 'नो अचरमाइं य अवत्तव्वयाइं य १८ नो वा 'अचरमाणि च अवक्तव्यानि च इति व्यपदिश्यते, 'नो चरमे य अचरमे य अवत्तव्वए य १९'नो 'चरमश्वाचरमश्वावक्तव्यश्च' इति वा व्यपदिश्यते, 'नो चरमे य अचरमे य अवत्तव्ययाई य २० नो 'चरमश्चाचरमश्चाबक्तव्यानि च' इति वा व्यपदिश्यते, 'नो चरमे य अचरमाई य अवत्तव्यए य २१ नो 'चरमश्चावरमाणिचावक्तव्यश्च' इति वा व्यपदिश्यते, 'नो चरमे य अपरमाई य अवत्तव्ययाई य २२' नो वा 'चरमश्वाचरमाणि चावक्तव्यानि च, इति व्यपदिश्यते, किन्तु-'सिय चरमाई स्कंध के समान 'चरम और नीचे के दो परमाणु भी चरम, इस प्रकार चार 'चरमौ' और एक परमाणु, अकेले परमाणु के समान अवक्तव्य होने से समग्र पंचप्रदेशी स्कंध 'चरमो-अवक्तव्य' कहलाता है। पंचप्रदेशी स्कंध 'चरमाणि-अवक्तव्यानि' नहीं कहा जाता, इसका कारण पूर्ववत् समझना चाहिए । वह 'अचरम-अवक्तव्य' भी नहीं कहलाता, इसका कारण भी पूर्ववतू समझना चाहिए। उसे 'अचरम-अवक्तव्यानि भी नहीं कहते, 'अचरमाणि-अवक्तव्य' भी नहीं कह सकते, 'अचरमाणि-अवक्तव्यानि' भीनहीं कहा जा सकता, 'चरम-अचरम-अवक्तव्य' भी नहीं कहते, 'चरमअचरम-अवक्तव्यानि' भी नहीं कह सकते, 'चरम-अचरमाणि-अवक्तव्य' भी नहीं कहा जा सकता, 'चरम-अचरमाणि-अवक्तव्यानि' भी नहीं कह विप्रा6 विदेशी २४.धना समान 'चरम' मने नीयन। मे ५२मा ५५ चरम से प्रारे यार 'चरमौ' भने २४ ५२मा, ४१॥ ५२॥नी समान २०१४तव्य डावाथी समय पय प्रदेशी २४५ 'चरमौ अवक्तव्य' उपाय छे. ५५ प्रदेशी २४५ 'चरमाणि-अवक्तव्यानि' नयी ४ाता, मेनु ४।२४ ५ पूर्ववत समय से नये. ते 'अचरम-अवक्तव्य' ५५ नथी ४४पाती, अनु ४।२६१ ५५५ पूर्ववत् सभ७ दे न . 'अचरम-अवक्तव्यानि' ५ नथी तो, 'अचरमाणि-अवक्तव्य' ५ नथी ४ही शstat. य२म अयरम अवतव्य ५ नयी ४३वात 'चरम-अचरम अवक्तव्यानि' ५ नथी ही शो 'चरम 'अचरमाणि-अवक्तव्य' ५५ नयी वाता १२म अ५२म मतव्य ५५ नयी पात'चरम अचरमाणि-अवतव्यानि, पर શ્રી પ્રજ્ઞાપના સૂત્ર : ૩
SR No.006348
Book TitleAgam 15 Upang 04 Pragnapana Sutra Part 03 Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGhasilal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1977
Total Pages955
LanguageSanskrit, Hindi, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, & agam_pragyapana
File Size62 MB
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