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________________ विपाकचन्द्रिका टीका श्रु. १, अ. ३, अभग्नसेनवर्णनम् ३५९ भुक्तोत्तरागतोऽपि च खलु जिमितः कृतभोजनः, भुक्तोत्तरं भोजनानन्तरम् आगतः-भोजनस्थानादन्यत्रागतः सन् 'आयंते' आचान्तः कृतचुलुकः, 'चोक्खे' चोक्षः करमुखप्रक्षालनेन शुद्धः, 'चोक्ख' इति देशीयः शब्दः । 'परमसुइभूए' परमशुचिभूतः-सर्वथा पवित्रो भूत्वा, ‘पंचहिं चोरसएहिं सद्धिं' पञ्चभिश्चौरशतैः सार्धम् 'अल्लं' आई, 'चम्म' चर्म ‘दुरुहइ' दृरोहति । ‘सण्णद्ध जाव पहरणे' सन्नद्धवद्धवर्मितकवचः, यावद् गृहीतायुधप्रहरणः, 'मग्गइएहिं' हस्तबद्धैः, 'जावरवेण' यावत्-फलकैः, निष्कृष्टाभिरसिभिः अंसगतैस्तूणैः, सजीवैर्धनुभिः, समुत्क्षिप्तैः शरैः, क्षिपतूर्येण वाद्यमानेन २ महता महता उत्कृष्टसिंहनादबोलकलकलरवेण, विस्वाद किया और दूसरों को भी खिलाया पिलाया । 'जिमियभुत्तुत्तरागएवि य गं समाणे आयंते चोक्खे परमसुइभूए पंचहिं चोरस एहिं सद्धिं अल्लं चम्मं दुरुहइ' भोजन कर चुकने पर फिर वह वहां से निकला और निकल कर उसने कुल्ला किया-हाथ मुंह को साफ कर शुद्ध किया। अच्छी तरह जब यह शुद्ध हो चुका तब पांचसो चोरों के साथ२ गीले चमडे के आसन पर बैठा 'दरुहिता' बैठ कर सब चोरों को सजित होने का आदेश दिया। अपने सेनापति का आदेश पाकर वे सब के सब सजित होगये। उसने भी स्वयं 'सण्णद्ध जाव पहरणे' कवच को पहिरा और आयुध प्रहरण आदि अनेक प्रकार के शस्त्रों को लिया। इस प्रकार 'मग्गइएहिं जाव रवेणं' हाथों में पकडी हुई ढालों से, म्यान से बाहिर काढी गई तलवारों से, कंधों पर टांगे गये भातों से, प्रत्यश्चासहित धनुषों से, उनपर आरोपित बाणों से सजित योधाओं के साथ२ जल्दी२ बजते हुए बादित्रों सास्वाद-विवाह ये भने भीमाने पy १२व्या पाव२०या, 'जिमियभुत्तु त्तरागएवि य णं समाणे आयंते चोक्खे परमसुइभूए पंचहिं चोरसएहिं सद्धि अल्लं चम्मं दुरुहइ' मा ४ पछी ते त्यांथी नीच्या मने नीदीन पछी કોગળા કર્યા હાથે મુખને સાફ કરી શુદ્ધ કરી બરાબર જ્યારે શુદ્ધ થઈ ગયું ત્યારે पांयसो थोशनी साथे भीमा-लीना यामानी भासन ५२ मे81. 'दूरुहिता' બેસીને તમામ ચેરોને તૈયાર થવાને હુકમ કર્યો, પછી પોતાના સેનાપતિને હુકમ थतi ते सौ स०१४-तैयार थ६ गया. तेणे पाते ! 'सण्णद्धजावपहरणे' वय પહેર્યું અને આયુધ પ્રહરણ આદિ અનેક પ્રકારનાં શસ્ત્રો લીધા, આ પ્રમાણે 'मग्गइएहिं जाव रवेणं' हाथामा ५४3जी ढासोथी, भ्यानमाथी १२ दी તલવારોથી, ખંભા પર ટાંગેલા તીરેના ભાથાથી પ્રત્યંચા સહિત ધનુષથી, તેના પર રાખેલા બાણોથી સજિત યોદ્ધાઓની સાથે એકી સાથે જલદી ૨ વાગનારા વાજીત્રાના શ્રી વિપાક સૂત્ર
SR No.006339
Book TitleAgam 11 Ang 11 Vipak Sutra Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGhasilal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1959
Total Pages809
LanguageSanskrit, Hindi, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, & agam_vipakshrut
File Size44 MB
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