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________________ प्रमेयचन्द्रिका टीका श०२४ उ.२१ सु०१ मनुष्याणामुत्पत्तिनिरूपणम् ३५७ पुषीनेरइए णं भंते ! जे भविए मणुस्से मु उजवन्जित्तए से णं भंते ! केवइयकाल. हिइएम् उपवज्जेना' शर्करापमापृथिवीनायिकः खलु भदन्त ! यो भव्यो प्रमुध्येत्पत्तुम् स खलु किपत्काल स्थिति के प्रत्ययेत इत्यादि एतानस्योत्तरे रत्न प्रमानारकापेक्षया वै ठसण्यं दर्शयन्नाह-'नारं जहन्नेग वापपुहुनटि एसु' नवरं जघन्येन वर्षपृथक्त्वस्थितिवेषु मनुष्येषु 'उको सेणं पुषकोडी आउएसु उक्व. ज्जेज्जा' उत्कर्षेण पूर्वकोटयायुकेपृत्पद्यते । रत्नप्रभानारकपकरणे जघन्यतो मास पृषवस्त्रस्थितिकेषु उत्पद्यन्ते इत्युक्तम् शर्करापमापकरणे तु जयन्येन वर्षपृथक्त्व उसी प्रकार से शर्कराप्रमा नारक की भी वही वक्तव्यता कह लेनी चाहिये। जैसे-'सकरप्पमापुढची नेरइए णं भंते! जे भथिए मणुस्सेसु उपयज्जित्तए से णं भंते ! केवइयकालटिएसु उववमेजना' अर्थात्गौतमने इस आलापक के द्वारा प्रभु से ऐमा पूछा है-हे भदन्त ! जो शर्कराममा पृथिवी का नैरपिक मनुष्यों में उत्पन्न होने के योग्य है वह कितने कालकी स्थिति वाले मनुष्यों में उत्पन्न होता है ? इत्यादि इस प्रश्न के उत्तर में रत्नप्रभा के नारक की अपेक्षा से विलक्षणता प्रकट करते हुए सूत्रकार कहते हैं-हे गौतम! वह 'नवरं जहन्नेगं वास हुत्तहिएप्सु उक्कोसेणं पुरुषकोडी आउएप्सु उववज्जेज्जा' जघन्य से वर्षे. पृषकत्व की स्थिति वाले मनुष्पों में और उत्कृष्ट से एक पूर्वकोटि की आयुवाले मनुष्यों में उत्पन्न होता है। रत्नप्रभा नारक के प्रकरण में जघन्य से मासपृथक्त्व की स्थितिवाले मनुरूपों में उसका उत्पाद कहा गया है। और यहां शर्करापमा के प्रकरण में जघन्य से वर्षपृथक्त्व मा ५९ ४थन ४२ न . २ -'सक्करप्पभा पुढवी नेरइए णं भंते ! जे मविए मणुस्सेतु उववज्जितए से णं भंते ! केवइयकालद्विइएसु उघवज्जेज्जो' અર્થાત ગૌતમ સ્વામીએ આ સૂત્રપાઠ દ્વારા પ્રભુને એવું પૂછ્યું છે કે-હે ભગવન શર્કરા પ્રભા પૃથ્વીના જે નરયિક મનુષ્યમાં ઉત્પન્ન થવાને ગ્ય છે. તે કેટલા કાળની સ્થિતિવાળા મનુષ્યમાં ઉત્પન્ન થાય છે? વિગેરે પ્રશ્નના ઉત્તરમાં રત્નપ્રભા પૃથ્વિના નારાથી જુદાપણું બતાવવા માટે સૂત્રકાર કહે 2-3 गौतम! a 'नवरं जहन्नेण वासपुहुत्तदिइन्सु उक्कोसेणं पुषकोडीआउएमु उववज्जेम्जा' -ययी वर्ष ५३वनी सिंपतिजा मनुष्योमा भने ઉતૃથી એક પૂર્વકેટિની આયુષ્યવાળા મનુષ્ય માં ઉત્પન્ન થાય છે. રત્નપ્રભા પથ્વીના નાના પ્રકરણમાં જઘન્યથી માસપૃથફની રિથતિવાળા મનુષ્યોમાં તેને ઉત્પાત કહેલ છે. અને અહિયાં શર્કરા ખભા વિના પ્રકરણમાં જળ શ્રી ભગવતી સૂત્ર : ૧૫
SR No.006329
Book TitleAgam 05 Ang 05 Bhagvati Vyakhya Prajnapti Sutra Part 15 Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGhasilal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1971
Total Pages969
LanguageSanskrit, Hindi, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, & agam_bhagwati
File Size57 MB
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