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________________ ४९८ भगवतीसूत्रे मंखलिपुत्तस्स बहुजणस्स अंतियं एयमढे सोच्चा निसम्म अयमेयारूवे अज्झथिए जाव समुपज्जिस्था'-ततः खलु तस्य गोशालस्य मंखलिपुत्रस्य बहुजनस्य अन्तिक-समीपे, एतमर्थम् -पूर्वोक्तार्थ श्रुत्वा, निशम्य-हृदि अवधार्य, अयमेतद्रूपा-वक्ष्माणस्वरूपः, आध्यात्मिक:-आत्मगतो यावत्-चिन्तितः, कल्पितः, पार्थितः मनोगतः संकल्पः समुदपद्यत-समुत्पनः-'जारिसियाणं ममं धम्मायरियस्स धम्मोवदेसगस्स समणस्स भगवओ महावीरस्स इडी, जुई, जसे, बले, वीरिए, पुरिसकारपरकमे लद्धे, पत्ते, अभिसमन्नागए' यादृशः खलु मम धर्माचार्यस्य धर्मोपदेशकस्य श्रमणस्य भगवतो महावीरस्य ऋद्धिः, द्युतिः यशः, बलम्, वीर्यम् , पुरुषकारपराक्रमो लब्धः, प्राप्तः, अभिसमन्वागतो वर्तते, 'नो खलु अस्थि तारिसियाणं अनस्स कस्सइ तहारुवस्स समणस्स वा, माहणस्त वा, इडी जीवन सफल है । सुलब्ध है । 'तए णं तस्स गोसालस्स मंखलिपुत्तस्स बहुजणस्स अंतियं एयमढे सोच्चा, निसम्म अयमेयारूवे अज्झस्थिए जाव समुप्पजिस्था' इस प्रकार से बहुजन के मुख से बातचीत सुनकर और उसे हृदय में धारण कर उस मंखलिपुत्र गोशाल को इस प्रकार का यह आत्मगत विचार उत्पन्न हुआ, यहां यावत् शब्द से चिन्तित, कल्पित, प्रार्थित, मनोगत संकल्प' इन विचार के विशेषणों का ग्रहण हुआ है, 'जारिसियाणं ममं धम्मायरियस्स धम्मोवदेसगस्स समणस्स भगवआ महावीरस्स इड्डी, जुई जसे, बले, वीरिए, पुरिसकारपरकमे, लद्धे, पत्ते, अभिसमभागए' जैसी ऋद्धि, जैसी युति, जैसा यश, जैसा बल, जैसा वीर्य और जैसा पुरुषकार पराक्रम मेरे धर्माचार्य धर्मोपदेशक श्रमण महावीर को लब्ध हुआ है, प्राप्त हुआ है, अभिसमन्वागत हुआ निसम्म अयमेयारूवे अज्झथिए जाव समुप्पज्जित्था " न भुमे या પ્રકારની વાતચીત સાંભળીને તથા તેને હૃદયમાં ધારણ કરીને તે મંખલીપુત્ર ગોશાલકના મનમાં આ પ્રકારને આત્મગત વિચાર ઉત્પન્ન થયે અહીં "यावत्" ५४ १३ " यिन्तित, पित, प्रार्थित, मनोगत" मा वियानां विशेष प्रसय ४रायां छे. “जारिसियाणं ममं धम्मायरियस्स धम्मोवदेसगस समणस्स भगवओ महावीरस्स इड्ढी, जुई, जसे, बले, वीरिए, पुरिसकारपरकमे, लद्धे, पत्ते, अभिसमन्नागए" २ द्धि, २वी धुति, २३यश, જેવું બળ, જેવું વીય અને જેવું પુરુષકાર પ્રરાક્રમ મારા ધર્માચાર્ય, ધર્મો. પદેશક શ્રમણ ભગવાન મહાવીરને લબ્ધ થયું છે. પ્રાપ્ત થયું છે અને શ્રી ભગવતી સૂત્ર: ૧૧
SR No.006325
Book TitleAgam 05 Ang 05 Bhagvati Vyakhya Prajnapti Sutra Part 11 Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGhasilal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1968
Total Pages906
LanguageSanskrit, Hindi, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, & agam_bhagwati
File Size53 MB
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