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________________ प्रमेयचन्द्रिका टीका श०१४ उ०१ सू०१ ना० अनन्तरोपपन्नकत्वादिनि० १६९ निजायुषः षण्मासे शेषे, भवप्रत्ययात् तिर्यग्योनिकमनुष्यायुष्कमेव बन्धन्ति, न नैरयिकदेवायुष्कमिति भावः । ' एवं जाव वेमाणिया' एवं पूर्वोक्तरीत्यैव यावत् अमुरकुमारादि वैमानिकपर्यन्ताः । अत्र विशेषमाह-'नवरं पंचिदियतिरिक्खजोणिया मणुस्सा य परंपरोक्वन्नगा चनारि वि आउयाई पकरेंति' शेषं तं चेव' नवरं-विशेषस्तु पश्चेन्द्रियतिर्यग्योनिका मनुष्याच परम्परोपपन्नकाश्चत्वार्यपि नैरयिकतिर्यग्योनिकमनुष्यदेवसम्बन्धीनि आयपि प्रकुर्वन्ति-बध्नन्ति, शेष तदेव-पूर्वोक्तरीत्यैवावसेयम् । अथानन्तरनिर्गत्वादिना नैरयिकादीनेव आश्रित्य प्ररूपयितुमाह-' नेरइया णं भंते ! कि अगंतरनिग्गया, परंपरनिग्गया, अणंतरहैं-वे अपनी आयु के ६ माप्त शेष रहने पर परभवनिमित्तक भव को आश्रित करके-तिर्यच आयु का और मनुष्य आयु का ही बंध करते हैं, नरकायु और देवायु का बन्ध नहीं करते हैं क्योंकि ऐसा नियम है कि देव मर कर देव नहीं होता और नारक मर कर नारक नहीं होता तथा नारक मरकर देव नहीं होता और देव मरकर नारक नहीं होता एवं जाव वेमाणिया' इसी प्रकार का कथन यावत् परंपरोपपन्न असुरकुमार से लेकर वैमानिक देवों तक में भी जानना चाहिये, परन्तु जो यहां विशे. षता है-वह इस प्रकार से है-'नवरं पंचिंदियतिरिक्खजोणिया मणुस्सा परंपरोववन्नगा चत्तारि वि आउयाई पकरेंति' परंपरोपपन्नक जो पंचे. न्द्रियतिर्यग् और मनुष्य हैं वे चारों प्रकार की आयुओं का बन्ध करते हैं। बाकी का और सब कथन पूर्वोक्त जैसा ही जानना चाहिये। अब છ માસ બાકી રહે ત્યારે અથવા વધારે વધારે છ માસ બાકી રહે ત્યારે અને ઓછામાં ઓછું અન્તર્મુહૂર્ત બાકી રહે ત્યારે ભવનિમિત્તક ભવને આશ્રિત કરીને તિર્યંચાયુને અને મનુષ્યાયુને જ બંધ કરે છે, નરકાયુ અને દેવાયુને બંધ કરતા નથી, કારણ કે એ નિયમ છે કે નારક મરીને નારક થતું નથી અને દેવ મરીને દેવ થતો નથી, તથા નારક મરીને દેવ થતું નથી દેવ મરીને નારક થા નથી. "एवं जाव वेमाणिया" मे २४यन ५२५२१५५४ मु२४મારથી લઈને વૈમાનિક દે પર્યન્તના જ વિષે પણ સમજવું પરંતુ मही' मा प्रारी विशेषता छ. "नवर पंचिंदियतिरिक्खजोणिया मणुस्सा पर परोववन्नगा चत्तारि वि आउयाई पकरें ति" ५२ पत्पन्न पयन्द्रिय તિર્યંચ અને મનુષ્ય છે, તેઓ ચારે પ્રકારના આયુને બંધ કરે છે. બાકિનું સમસ્ત કથન નારકાના પૂર્વોકત કથન પ્રમાણે જ સમજવું હવે ગૌતમ भ० २२ શ્રી ભગવતી સૂત્રઃ ૧૧
SR No.006325
Book TitleAgam 05 Ang 05 Bhagvati Vyakhya Prajnapti Sutra Part 11 Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGhasilal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1968
Total Pages906
LanguageSanskrit, Hindi, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, & agam_bhagwati
File Size53 MB
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