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________________ प्रमैयचन्द्रिका टीका श० १४ उ० १ उद्देशार्थसंग्रहगाथाप्ररूपणम् संग्रहगाथामाह-'चरमु१ म्मद२' इत्यादि । चरमदेवावासे इति सूचकत्वात् चरमशब्दोपलक्षितत्वेन चरमनामकः प्रथमोद्देशकः१, उन्मादार्थस्याभिधायकत्वात् उन्मादोनाम द्वितीयोदेशकार, शरीरार्थस्य अभिधायकत्वात् शरीरशब्दोपलक्षितस्वाच शरीरनामकस्तृतीयोद्देशकः ३, पुद्गलार्थस्य अभिधायकत्वात् पुद्गलनामा चतुर्थोद्देशकः ४, अग्निशब्दोपलक्षित अग्निनामकः पश्चमोद्देशकः ५, किमाहारा इत्येवंभकारक प्रश्नोपलक्षितत्वात् कतिसंख्यकाहारः किमाहारनामकः षष्ठोदेशका ६, 'चिरसंश्लिष्टोऽसि' 'गोयमा !' इत्येतद् घटकसंश्लिष्टशब्दोपलक्षितत्वात् संश्लिष्टनामकः सप्तमोद्देशकः ७, पृथिवीनामन्तरार्थ प्रतिपादकत्वात् अनन्तरो नामा. एमोद्देशकः ८, अनगारशब्दस्यादौ विद्यमानत्वात् अनगारो नाम नवमोद्देशकः ९, अर्थवाले इस १४ वें शतक को प्रारंभ कर रहे हैं। इसमें सब से पहिले वे १० उद्देशकों में जो विषय कहा गया है-उसे संग्रह गाथा द्वारा प्रकट करते हैं-चमरदेवावास का सूचक होने से तथा चमर शब्द से उपलक्षित होने से चमर नामका पहिला उद्देशा है, उन्माद अर्थका अभिधायक होने से उन्माद नाम का द्वितीय उद्देशा है २, शरीर अर्थका अभिधायक होने से तथा शरीरशन्द से उपलक्षित होने से शरीर नाम का तीसरा उद्देशा है। पुद्गलार्थ का कथन होने से पुद्गल नामका चौथा उद्देशा है । अग्निशब्द से उपलक्षित अग्निनाम का पांचवा उद्देशा है। 'किमाहारा इस प्रकार के प्रश्न से उपलक्षित होने से किमाहार नाम का छट्ठा उद्देशा है। 'चिरसंश्लिष्टोऽसि गोयमा' इसमें के संश्लिष्टशब्द से उपलक्षित होने के कारण संश्लिष्ट नामका सातवां उद्देशा है । पृथिवीयों में अन्तररूप अर्थ का प्रतिपादक होने से अन्तर नामका आठवां उद्देशा શતકમાં જે દસ ઉદ્દેશકે આવે છે, તેમને સંગ્રહ જે સંગ્રહણી ગાથામાં કરવામાં આવ્યું છે તે ગાથાને ભાવાર્થ બતાવવામાં આવે છે પહેલે ઉદ્દેશક ચરમદેવાવાસને સૂચક હોવાથી તથા ચરમ શબ્દ વડે ઉપલક્ષિત હોવાથી તેનું નામ “ચરમ” આપ્યું છે. ઉન્માદ અર્થને ધારણ કરનાર ઉન્માદ નામને બીજો ઉદ્દેશક છે. શરીર અને અભિધાયક અને શરીર શબ્દ વડે ઉપલક્ષિત શરીર નામને ત્રીજો ઉદ્દેશક છે. પુદ્ગલ નામના ચોથા ઉદ્દેશામાં પુનું પ્રતિપાદન કર્યું છે. અગ્નિ શબ્દ વડે ઉપલક્ષિત भनि नामन पायी देश छ. " किमाहारा” 21 ५२ना प्रश्नयी ५. सक्षित माहा२ नमन। छटो देश छ. “चिरसंश्लिष्टोऽसि गोयमा " આ સૂત્રપાઠમાં સંશ્લિષ્ટ શબ્દ વડે ઉપલક્ષિત સાતમાં ઉદ્દેશકનું નામ સંશ્લિષ્ટ શ્રી ભગવતી સૂત્ર: ૧૧
SR No.006325
Book TitleAgam 05 Ang 05 Bhagvati Vyakhya Prajnapti Sutra Part 11 Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGhasilal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1968
Total Pages906
LanguageSanskrit, Hindi, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, & agam_bhagwati
File Size53 MB
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