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________________ ___ भगवतीसो वीर तीर्थकरोपदेशेन प्रवृत्तत्वान्न कोऽपि दोषः सर्वज्ञा हि द्रव्य-क्षेत्र-कालभावं ज्ञात्वैव यत्किञ्चित् कथयन्ति इति । __ " तएणं से खंदए अणगारे " ततः खलु स स्कन्दकोऽनगारः " मासियं भिक्खुपडिम" मासिकी भिक्षुपतिमाम् " अहामुत्तं " यथामत्रम्-मूत्रनिर्दिष्टविध्यनुसारम् । “ अहाकप्पं " यथा कल्पम् कल्पं स्थविरादिकल्पमनतिक्रम्यकल्पानुसारमित्यर्थः। 'अहामग्गं' यथामार्गम् ज्ञानदर्शनचारित्ररूपमोक्षमार्गानतिक्रमेण, क्षयोपशमभावानतिक्रमेण वा । 'अावच्चं' यथा तत्वम्=तत्त्वानतिक्रमेण, यद्वा ' यथा तथ्यम्' इतिच्छायापक्षे सत्यानुसारम् 'अहा सम्म' यथा साम्यं = समभावमनतिक्रम्य - सुष्टुप्रकारेण कर्मनिर्जरणभावनयेत्यर्थः 'काएण' कायेन=शरीरेण न पुनरभिलाषमात्रेण 'फासई' स्पृशति-समुचितकाले. सविधिग्रहणात् 'पालेइ' पालयति = वारंवारमुपयोगेन तस्यां तत्परत्वात् । इस लिये इस कथन में कोई विरोध नहीं है । क्यों कि सर्वज्ञ भगवान जो कुछ कहते हैं वह द्रव्य क्षेत्र कालभाव को देखकर ही कहते हैं। (तएणं से खदए अणगारे ) मासिकी प्रथम भिक्षु प्रतिमा धारण कर. लेने के बाद उन स्कन्दक अनगार ने उस ( मासियं भिक्खुपडिमं ) मासिक भिक्षु प्रतिमा को ( अहात्त) सूत्रकथित विधि के अनुसार (अहाकप्पं ) स्थाविरादि कल्प के अनुसार ( अहामग्गं) सम्यगदर्शन सम्यग्ज्ञान और सम्यक चारित्र रूप मोक्षमार्ग के अनुसार अथवा यथातथ्य-सत्य के अनुसार, (अहासम्मं ) समभाव के अनुमार अथवा कर्म निर्जरा की भावना के अनुसार, ( कोएणं) अपने शरीर से किन्तु अभिलाषा मात्र से नहीं (फासेह) स्पर्श फिया अर्थात्-समुचित काल में विधि सहित उसे ग्रहण किया। अतः ( पालेइ ) बारंबार મહાવીર પ્રભુની આજ્ઞા લઈને ભિક્ષપ્રતિમાનું આરાધન કર્યું હતું. તેથી તે કથનમાં કઈ શંકા રહેતી નથી. કારણ કે સર્વજ્ઞ ભગવાન જે કંઇ કહે છે તે દ્રવ્ય ક્ષેત્ર કાળ અને ભાવને જોઈને જ કહે છે. “तएण से खंदए अणगारे" त्या२ मा २४४४ २५५॥रे " मासियभिक्खपडिमं " भासिर भिक्षुप्रतिभानु · अहासुतं" सूत्रम तासी विधि प्रमा, “अहामग्गं" सभ्य दर्शन सभ्य ज्ञान गने सभ्यर यात्रि ३५ मोक्षमार्गानुसार अथवा पाताना क्षयोपशम भावमनुसार “ अहा तच्चं" तत्व अनुसार अथवा सत्यने मनुसरीने, “ अहासम्म'" सममा अनुसार मया भनिनी भावना अनुसार, "काएण" पोताना शरीरथी- नहीं है मात्र मलिदापाथी- ' फासेइ” २५ ध्या-मेटले ३ से भास सुधी विधि सहित तेनी माराधना ४री. पालेइ यतन। ५४ माराधना ४२वाने શ્રી ભગવતી સૂત્ર : ૨
SR No.006316
Book TitleAgam 05 Ang 05 Bhagvati Vyakhya Prajnapti Sutra Part 02 Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGhasilal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1962
Total Pages1114
LanguageSanskrit, Hindi, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, & agam_bhagwati
File Size65 MB
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