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सिरों को बाहर की ओर किंचित् घुमाव दे दिया जाता है। सबसे ऊपर की पड़ी रेखा के ऊपर तीन बिन्दु बनाये जाते हैं, जिनके ऊपर अर्धचन्द्र बनाया जाता है और उसके ऊपर एक शून्य स्थापित किया जाता है। कभी-कभी चारों कोष्ठकों में भी एक-एक बिन्दु बना दिया जाता है, अथवा उनके साथ ही बाहर की ओर भी चारों दिशाओं में एक-एक बिन्दु बना दिया जाता है। यह स्वस्तिक का जैन परम्परा में पूर्ण विकसित रूप है। वैसे उसका मूल रूप एवं मुख्य अंश उक्त दिशाओं आदि से रहित मात्र रेखाओं से बना आकार ही है।
स्वस्तिक के मूलरूप को कलाकारों ने अनेक सुन्दर रूप प्रदान किये जिनके उदाहरण मथुरा के कंकाली टीले से प्राप्त साधिक दो सहस्र वर्ष प्राचीन जैन आयागपट्टों में, उससे भी पूर्वकाल की उड़ीसा की खारवेल-कालीन हाथीगुम्फा आदि में तथा उत्तरवर्ती के अनेक जैन मूर्ताङ्कनों, स्तम्भों, वेदिकाओं, सूचियों, छत्तों, भित्तियों आदि एवं लघु चित्रों आदि में प्राप्त होते हैं।
इस प्रतीक का सीधा-सादा परम्परानुमोदित रहस्य या भाव तो यही प्रतीत होता है कि खड़ी रेखा चेतन तत्त्व (आत्मा या जीव) की सूचक है, पड़ी रेखा जड़ तत्त्व (पुद्गल/अजीव) की सूचक है, और उनके सिरों के घुमाव यह सूचित करते हैं कि जड़ पुद्गल के संयोग से जीवात्मा जिस चतुर्गति रूप संसार में निरन्तर संसरण करता आ रहा है, उससे मुक्त होने के लिए भी छटपटा रहा है। भीतर के चार बिन्दु चार घातिया कर्मों के सूचक हैं जो उसे संसार में रोके हुए हैं, तथा उन चार आराधनाओं (ज्ञान, दर्शन, चारित्र
और तप) के भी सूचक हैं जिनकी साधना से उक्त कर्मों को समाप्त करके वह अनन्तचतुष्टय का धनी हो जाता है। बाहर के चार बिन्दु अनन्त चतुष्टय के सूचक हैं। ऊपर के तीन बिन्दु रत्नत्रय के प्रतीक हैं, जिनकी पूर्णता अर्धचन्द्र से सूचित सिद्धालय में स्थित शून्य के रूप में निराकार सिद्धत्व का बोध कराती है।
जैन धर्मादिक धर्म को सार तुतिकता 76