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ध्यान दिये बिना या उन सबकी अपेक्षा किये बिना आहार ग्रहण करना गोचरी या गवेषणा आहार-वृत्ति है ।
चूर्णिकार जिनदास गणि ने भी गोचरी आहार वृत्ति के विषय में इसी प्रकार का उदाहरण देते हुए कहा है कि जैसे एक युवा वणिक् - स्त्री अलंकृत, विभूषित हो, सुन्दर वस्त्र धारण कर गोवत्स को आहार देती है । किन्तु वह गोवत्स उसके हाथ से उस आहार को ग्रहण करता हुआ भी उस स्त्री के रंग, रूप, आमरणादि के शब्द, गंध और स्पर्श में मूच्छित नहीं होता है । इसी प्रकार साधु भी विषयादि शब्दों में अमूच्छित रहता हुआ आहारादि की गवेषणा में प्रवृत्त हो । (दशवैकालिक - 5/1/1 की चूर्णि, पृ. 167-168) ।
आचार्य हरिभद्र ने 'गोचर' शब्द का अर्थ किया है- गाय की तरह चरना - भिक्षाटन करना । जैसे गाय अच्छी-बुरी घास का भेद किये बिना चरती है, वैसे ही साधु को उत्तम, मध्यम और अधम कुल का भेद न करते हुए तथा प्रिय-अप्रिय आहार में रागद्वेष न करते हुए भिक्षाटन करना चाहिए । (दशवैकालिक- हरिभद्रीय टीका, पत्र 18 ) | निष्कर्ष यह है कि 'गोचरी' में 'समता' भावना अन्तर्निहित होती है ।
(विकारवर्धक आहार का त्याग:-)
वैदिक व जैन- दोनों परम्पराएं संन्यासी व भिक्षु के लिए रागादिवर्धक व कामोत्तेजक स्निग्ध आहार के त्याग का निर्देश करती है। वैदिक परम्परा के संन्यासोपनिषद् (2/76) में कहा हैघृतादीन् वर्जयेद् यतिः, अर्थात् घृत आदि वस्तुओं का मुनि / यति त्याग करे | जैन परम्परा में वर्णित भिक्षाचर्या-सम्बन्धी निरूपणों में भी अत्यधिक सरसस- स्निग्ध-गरिष्ठ पदार्थों के सेवन को वर्जनीय बताया गया है (द्र. कल्पसूत्र - 237, उत्तराध्ययन-32/61-68, 16/सू.9, 16/ 7,15,17/15,3/26 आदि) ।
प्रथम खण्ड / 65