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को जोड़कर अवतारों की संख्या 24 तक पहुंचा दी। पांचरात्र संप्रदाय में ईश्वर के चौबीस पर्याय-विभव माने गए हैं । जैसे, एक दीपक से कई दीपक प्रज्वलित हो जाते हैं, वैसे ही एक ही ईश्वर के ये विविध रूप होते हैं (द्र. बृहद्हारीत स्मृति-1/5/145)। उक्त संख्या जैन तीर्थंकरों की 24 संख्या से मेल खाती है। दोनों परम्पराओं का यह साम्य अद्भुत है।
सारांश यह है कि वैदिक परम्परा में 24 अवतारों की संख्या में नाम जोड़े व घटाये जाते रहे। इसी प्रसंग में एक तथ्य की ओर संकेत करना अपेक्षित होगा। वह यह कि वैदिक अवतारों में वराह, कूर्म, हयाश्व- ये तीन नाम प्राप्त होते हैं।जैन अवतारों के चिन्हों में भी इनका अस्तित्व है। जैसे तृतीय तीर्थंकर का अश्व, 1 3 वें तीर्थंकर का वराह, तथा 2 वें तीर्थंकर सुव्रत का कूर्म चिह्न माना गया है।
गृहस्थ-चर्या और भिक्षु-चर्या:__वैदिक व जैन इन दोनों धर्मों की गृहस्थ-चर्या और भिक्षु/ संन्यासी-चर्या में भी पर्याप्त समानता है। इसमें सन्देह नहीं कि दोनों धर्मों की अपनी-अपनी मौलिक विशेषताएं यथावस्थित हैं, तथापि कुछ उल्लेखनीय साम्य भी उन दोनों में है जिससे उन दोनों में अनुस्यूत एकता रेखांकित होती है।
(1) गृहस्थ व श्रावक का सामान्य जीवन:
वैदिक परम्परा के ब्रह्मचारी व गृहस्थ की चर्या को देखें और दूसरी तरफ जैन परम्परा के श्रावक/श्रमणोपासक की जीवनचर्या को देखें तो दोनों में 'अहिंसा' धर्म अनुस्यूत दृष्टिगोचर होता है। दोनों ही धर्म, अपने असंन्यस्त जीवन में भी यथाशक्ति अहिंसा, समता, संयम, त्याग, सहिष्णुता व परोपकार आदि की भावना को क्रियान्वित करने का सदुपदेश या मार्गदर्शन देते हैं।
जैन धर्म एतं वैदिक धर्म की सारगतिक (ll/56
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