________________
- प्रो. श्री रामप्रसाद जी चन्दा ने इन सीलों का गंभीर अध्ययन कर मोडर्न रिव्यू के अंक अगस्त 1932 के प्रकाशन में जो अपना अभिमत प्रगट किया है, उसका सारांश निम्न प्रकार है:
मिस्त्र में (ईजिप्सयन) भी प्राचीन मूर्तियां हैं, जिनके दोनों हाथ लटक रहे हैं। ये प्राचीन मूर्तियां ग्रीक मूर्तियों जैसी हैं किन्तु इनमें वैराग्य की दृष्टि का- जो कि मोहनजोदड़ो और मथुरा की (ईसा की दूसरी शताब्दी की भ.ऋषभदेव की खड्गासन मूर्तियों) जैन मूर्तियों में पायी जाती है- अभाव है।
वृषभ का अर्थ बैल है, और बैल ऋषभनाथ का चिन्ह है। प्लेट नं. 2 से 5 नं. तक की सीलों पर खड़ी हुई मूर्तियां जो कि बैल सहित हैं भ. ऋषभदेव की प्रतिकृति हैं । उच्च मूर्तियों का कायोत्सर्ग आसन विशेषरूप से जैन परम्परा में प्राप्त होता है और इन मूर्तियों को जैन सिद्ध करता है।
ये सीलें 5 हजार वर्ष पूर्व प्राचीन मालूम देती हैं। इससे प्रमाणित होता है कि जैनधर्म के आदि संस्थापक श्री ऋषभनाथ की पूज्यता बहुत प्राचीन समय से चली आ रही है।
डा. श्री प्राणनाथ जी विद्यालंकार (हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी में इतिहास के प्राध्यापक) जी के शब्दों में:- 'मोहनजोदड़ो की साढ़े पांच हजार वर्ष पुरानी 449 वीं सील पर जिनेश्वर य जिनेश शब्द अंकित है। जिनेश या जिनेश्वर शब्द जैनधर्म के प्रचारक एवं प्रवर्तक तीर्थंकर का द्योतक है।' उपर्युक्त अभिमत से यह स्पष्ट है कि साढ़े पांच हजार वर्ष पूर्व जैन तीर्थंकरों की श्रेष्ठता समाज में प्रतिष्ठित हो चुकी थी।
जैन तीर्थंकर और अवतार
जैन धर्म अवतारवाद को नहीं मानता, वह उत्तारवाद का समर्थक है। इसके विपरीत, वैदिक परम्परा अवतारवाद की समर्थक
प्रथम खण्ड/53