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हुए कहा- 'चिरकाल तक तपस्या रत रहने के कारण आपके मस्तक पर बढ़ी हुई जटाएं ऐसी लगती हैं जैसे ध्यानानि से दहकते कर्म रूपी ईंधन से निकलती धूम - समूह की श्यामल जटायें ही हों ।' चिरं तपस्यतो यस्य जटा मूर्ध्नि बभुस्तराम् । ध्यानाग्निदग्धकर्मेन्धन्निर्य धूम - शिखा इव ॥
(आदिपुराण - 1/9) (9) गंगावतरण हेतु राजा भगीरथ क प्रयत्नों की लता में सफलता:- भगीरथ के प्रयत्नों की लता में सफलता का पुष्प यदि नहीं खिला होता तो प्रलय - दग्ध यह वसुंधरा 'मरू-भूमि' ही बनी रह गई होती। शिव ही मरू-लोक के लिए उस अमृत-धार के संवाहक बने । उस धारा ने संतप्त जगत् को शीतलता प्रदान की थी । जैन भक्तिकाव्यों में भगवान् की वाणी को गंगा की उपमा से मण्ड किया गया है ।
आचार्य जिनसेन ने उस शीतलवाहिनी गंगा की पहिचान भगवान् आदिनाथ की वचनगंगा से की है। उन्होंने लिखा- 'हे भगवन्! आपकी यह दिव्य वचनावली अज्ञानान्धकार के प्रलय में विनष्ट जगत् की पुनरूत्पत्ति के लिए न सींचे गये अमृत के समान मालूम होती है'
तमः प्रलयलीनस्य जगतः सज्जनं प्रति । त्वयामृतमिवासिक्तमिदमालक्ष्यते वचः ॥
(आदिपुराण 1/158) वादिराज महामुनि ने भगवान् की स्तुति करते हुए ऐसी विलक्षण भक्ति गंगा की कल्पना की है जो स्याद्वाद - गिरि से निकलकर, भगवान् के चरणों का स्पर्श करती हुई, मोक्षरूपी सागर में विलीन होती है
प्रत्युत्पन्ना नयहिमगिरेरायता चामृताब्धेर्या देव त्वत्पदकमलयोः संगता भक्तिगंगा ।
जैन धर्म एवं वैदिक धर्म की सास्कृतिक एकता 50