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आदिपुराण में आ . जिनसेन ने उक्त गूढार्थक विशेषणों
की सार्थकता को जैन परम्परा के अनुरूप समझाने का भी यत्न किया है (द्र. आदिपुराण 24/69-72) | उदाहरणार्थ- ऋषभदेव के गर्भ में आते ही परिवार में सोने की वृष्टि हुई थी, अतः इनका नाम 'हिरण्यगर्भ' है:
हिरण्यगर्भमाहुस्त्वां यतो वृष्टिर्हिरण्मयी । गर्भावतरणे नाथ प्रादुरासीत् तदाऽद्भुता ॥ (आदिपुराण - 24/69)।
इसी तरह, चतुर्मुखी / चतुरानन, वृषभ आदि विशेषणों की सार्थकता जैन पुराणों में बताई गई है और यह प्रवृत्ति ऋषभदेव की वैदिक ब्रह्मा से समकक्षता सिद्ध करती है ।
जिस प्रकार वैदिक परम्परा में ब्रह्मा की पुत्री सरस्वती समस्त विद्याओं की प्रवर्तिका मानी जाती है, उसी प्रकार जैन परम्परा में ऋषभदेव की पुत्रियां ब्राह्मी व सुन्दरी समस्त विद्याओं की प्रवर्तिका हैं (द्र. त्रिषष्टिशलाका पुरुष चरित-1 /2/96-62, आदिपुराण16/14 अध्याय) । उक्त तथ्य भी ऋषभ देव की वैदिक ब्रह्मा से तुल्यता का समर्थन करता है ।
(ऋषभदेव की शिव-तुल्यता:-)
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वैदिक परम्परा में 'शिव' निर्ग्रन्थ, दिगम्बर, कामजयी व महान् योगी के रूप में प्रसिद्ध हैं । वे संसार के संहारक देव भी माने जाते हैं। संहारकता का प्रतीकात्मक अर्थ यहां ग्राह्य है। संसार का अर्थ है - जन्म-मरण की परम्परा | अध्यात्मसाधक जन्म-मृत्युरूपी संसार का संहार करता है । उक्त दृष्टि से शिव की संसार-संहारकता समझें तो किसी भी जैन मुनि की शिवतुल्यता हृदयंगम की जा सकती है। इस युग के जैन श्रमण परम्परा के आद्य प्रवर्तक एवं अध्यात्म-साधना के पुरस्कर्ता भगवान् ऋषभदेव की - जिन्हें वैदिक
प्रथम खण्ड/43