________________
वैदिक परम्परा में सामान्यतः ब्रह्मा को इस सृष्टि का प्रमुख कर्ता मानकर स्रष्टा, प्रजापति, धाता, विधाता, पितामह, स्वयम्भू, हिरण्यगर्भ आदि नामों से अभिहित किया जाता है (द्र. भागवत पुराण- 3/8/32, 3/1/13/12/28, 3/12/47) | अमरकोष (1/16-17) के अनुसार ब्रह्मा के निम्नलिखित पर्याय / नामान्तर हैं - ब्रह्मा, आत्मभू, सुरज्येष्ठ, परमेष्ठी, पितामह, हिरण्यगर्भ, लोकेश, स्वयम्भू, चतुरानन, धाता, विधाता, कमलयोनि, विरञ्चि, कमलासन, स्रष्टा, प्रजापति, वेधा, विश्वसृज्, विधि आदि ।
जैन परम्परा के पुराण - साहित्य में ऋषभदेव को 'ब्रह्मा' के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है । इन्हें 'आदिवेधा' के रूप में गुणकर्माधारित क्षत्रियादि वर्णों का उत्पादक बताया गया हैउत्पादितास्त्रयो वर्णाः, तदा तेनादिवेधसा । क्षत्रियाः वणिजः शूद्राः क्षतत्राणादिर्गुणैः (हरिवंशपुराण - 16/183) । यहां यह उल्लेखनीय है कि ऋषभदेव ने मात्र तीन वर्णों की ही स्थापना की है। शेष ब्राह्मण वर्ण की स्थापना ऋषभ - पुत्र भरत ने की थी ऐसा जैन पुराणों का अभिमत है (द्र. आदिपुराण 16 / 246 ) |
उक्त तीनों वर्णों की उत्पत्ति का निरूपण जैन परम्परा में वैसा ही है जैसा कि वैदिक परम्परा में मान्य है । अर्थात् भुजा से क्षत्रिय, ऊरू (कटि प्रदेश) से वैश्य तथा पांवों से शूद्र वर्ण की उत्पत्ति मानी गई है, यद्यपि उक्त निरूपण का लाक्षणिक / प्रतीकात्मक अर्थ भी समझाया गया है । (द्र आदिपुराण - 16 / 243-246)। इन वर्गों की उत्पत्ति करने के कारण ऋषभदेव 'स्रष्टा' कहलाए - स्रष्टेति ताः प्रजाः सृष्ट्वा (द्र. आदिपुराण 16 / 25 ) । चक्रवर्ती भरत द्वारा ऋषभदेव की जो पौराणिक स्तुति प्राप्त होती है, उसमें उन्हें ब्रह्मा, स्रष्टा, पितामह, आदिपुरुष, स्वयम्भू पुराणपुरुष, हिरण्यगर्भ चतुर्मुख आदि-आदि नामों से अभिहित किया गया है (द्र आदिपुराण 24 वां पर्व, जिनसहस्रनाम स्तोत्र, आ. समन्तभद्रकृत बृहत्स्वयम्भू स्तोत्र आदि) ।
जैन धर्म एक धर्मका कृतिक एकता 42