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(7) गंगा देवी की महिमा:
वैदिक परम्परा में गंगा का माहात्म्य व यशोगान अनेक रूपों में वर्णित किया गया है। ब्रह्मवैवर्तपुराण (1/11/16) में कहा गया है- नास्ति गंगासमं तीर्थम् अर्थात् गंगा के समान कोई तीर्थ नहीं है। पौराणिक कथा के अनुसार, राजा सगर के पुत्र ब्राह्मण के तिरस्कार के कारण भस्म हो गए थे। अपने मृत पितरों के उद्धार के लिए राजा भगीरथ ने वर्षों तक तपस्या की और स्वर्ग से गंगा को पृथ्वी पर अवतरित कराने में वे सफल हुए।
शिव महादेव ने उस गंगा को अपने मस्तक पर धारण करने की स्वीकृति दी। गंगा-जल के स्पर्श से सगर-पुत्रों को स्वर्गति प्राप्त हुई। यह गंगा भगवान् विष्णु के चरण-कमलों से निःसृत होकर पृथ्वी पर अवतरित हुई थीं (द्रष्टव्यः भागवत पुराण- 9/8/29; 9/ 9/1-15)।
जैन परम्परा में गंगा को तीर्थ के रूप में तो मान्यता नहीं दी गई है, किन्तु उसे आदर देते हुए एक 'देवी' के रूप में स्वीकारा गया है और भगवान जिनेन्द्र के साथ संयुक्त कर इसकी महिमा अवश्य बढाई गई है। जैन पुराणों में वर्णित है कि राजा सगर ने अपने पुत्रों के समक्ष इच्छा प्रकट की कि भरत चक्रवर्ती ने कैशाल पर्वत पर महारत्नों से जिनेन्द्र देव के चौबीस मन्दिर बनवाएं हैं, उस पर्वत के चारों ओर गंगा नदी को ले आओ। उक्त इच्छा को पूरी करने में वे पुत्र सफल तो हुए किन्तु नागकुमारों के कोप से वे भस्मीभूत हो गए। राजा सगर ने विरक्त होकर मुनि-दीक्षा धारण की। उन्होंने राज्य-भार राजा भगीरथ को सौंपा था।
कालान्तर में राजा भगीरथ भी विरक्त होकर मुनि बने और गंगा-तट पर समाधिस्थ हो गए। इन्द्र ने क्षीरसागर से भगीरथ मुनि के चरणों का अभिषेक किया जिसका जल गंगा में प्रवाहित