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मुक्ति प्राप्त कर सकते हैं और यहीं से (कर्मानुसार) तिर्यंच व नरक जैसी गतियों में जाते हैं- अतः यह कर्मभूमि है। इस भारतवर्ष के सिवा अन्य क्षेत्र में कर्मभूमि नहीं है। - वैदिक परम्परा में 'चतुर्युग' की भी अवधारणा है। सत्य युग, त्रेता युग, द्वापर युग और कलियुग- ये चार युग माने गए हैं। त्रेता में भगवान् राम तथा द्वापर में श्रीकृष्ण का अवतार हुआ माना जाता है। वर्तमान में कलियुग की प्रवर्तना है । भागवत पुराण के अनुसार सत्ययुग में धर्म अपने चार चरणों से युक्त होकर पूर्ण स्वस्थ रहता है और कलियुग तक आते-आते यह एक पांव वाला रह जाता है (द्रष्टव्यः भागवत पुराण 1/17/24-25, 3/12/21, मनुस्मृति1/81-85) जैन परम्परा में चतुर्युग विभाजन तो प्राप्त नहीं है, तथापि वैदिक परम्परा की उक्त व्यवस्था क्रमशः ह्रासमुखी है और जैन परम्परा के 'अवसर्पिणी' कालचक्र के प्रतिकूल नहीं है।
(कुलकर-व्यवस्थाः)
जैन परम्परा में 'कुलकर' की अवधारणा और वैदिक परम्परा की 'मनु' (मन्वन्तर) की अवधारणा में साम्य झलकता है। जैन मान्यतानुसार 'कुलकर' सामाजिक संस्थापक होते हैं। भोग व त्याग के समन्वित जीवन को प्रतिपादित करना, जीवन-मूल्यों को नियमबद्ध कर एकता व मर्यादा में संस्थापित करना, अनुशासन की स्थापना, शान्ति व सन्तुलन कायम करना, सामाजिक कल्याणकारी रीति-रिवाजों को प्रचलित करना आदि कुलकरों का उद्देश्य माना जाता है (द्र. आदिपुराण-3/22-163, हरिवंश पुराण-7/1617, पद्मपुराण- 3/3-88 आदि)।कुलकरों की संख्या 7, 14 या 16 मानी गई है। जम्बूद्वीप प्रज्ञप्ति (2/35) नामक जैन आगम में आदि तीर्थंकर ऋषभदेव से पूर्व 14 कुलकरों का होना माना गया है। पउमचरियं (पद्मचरित 3/5-55) में उसी का अनुकरण करते हुए 14 कुलकरों के नाम इस प्रकार बताये गये हैं