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जैन परम्परा में भी उक्त चारों पुरुषार्थों की मान्यता प्राप्त है और धर्म को प्रधान साधन तथा मोक्ष को प्रधान लक्ष्य भी माना गया है । आचार्य जिनसेन ने आदिपुराण में धर्म, अर्थ, काम - इस त्रिवर्ग (द्र. आदिपुराण - 2 / 31 ) को मान्यता दी है (अर्थे चतुष्टयी वृत्ति: उत्तरपुराण- 51/7-8) । जैन आचार्य जिनसेन व गुणभद्र ने 'महापुराण' में धर्म, अर्थ, काम- इस त्रिवर्ग की धर्मानुकूलता को मान्यता दी है (द्र. आदिपुराण - 2 / 31, उत्तरपुराण- 51 / 7-8 ) | आचार्य हेमचन्द्र ने मोक्ष को प्रधान पुरूषार्थ मानते हुए स्पष्ट कहा है:
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चतुर्वर्गेऽग्रणीर्मोक्षः (हैमयोगशास्त्र- 1 /15) ।
आचार्य उमास्वाति ने प्रशमरतिप्रकरण (132) में धर्मअविरूद्ध समस्त लोक व्यवहार चलाने की प्रेरणा दी हैसद्धर्मानुपरोधात् तस्माल्लोकोऽभिगमनीयः ।
दोनों ही परम्पराओं ने समाज व राष्ट्र के अभ्युदय एव प्राणिमात्र के सुख, कल्याण व हित की कामना करते. हुए ''अहिंसा धर्म' की सार्वजनीनता को व्यावहारिक अभिव्यक्ति दी है। निष्कर्षतः दोनों परम्पराओं के सांस्कृतिक उदात्त चिन्तन का सार इस प्रकार रहा है:
सर्वेषां मंगलं भूयात्, सर्वे सन्तु निरामयाः । सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा काश्चिद् दुःखभाग्भवेत् ॥
(गरुडपुराण, 2/35/52) अर्थात् सभी का कल्याण हो, मंगल हो, सभी नीरोग हों, कोई दुःखी न हो और सभी लोग मंगलमय देखें - अनुभव करें। महाकवि कालिदास ने भी इसी चिन्तन को एक वाक्य में अभिव्यक्त किया है- सर्वः सर्वत्र नन्दतु (विक्रमोर्वशीय 5/25)- अर्थात् समस्त प्राणी सर्वत्र / सर्वदा प्रसन्न रहें ।
वैदिक परम्परा के उपर्युक्त चिन्तन से पूर्णतः साम्य रखता हुआ जैन परम्परा का निम्नलिखित वचन है:
जैन धर्म एवं वैदिक धर्म की साकृतिक एकता / 28