________________
- कामनाएं संसार की हेतु हैं अर्थात् वे मनुष्य को संसार (जन्म-मरण चक्र) में बांधती हैं।
(7) सयेहिं परियाएहिं, लोयं बूया कडे त्ति य। तत्तंतेण विवाति,मविवासीकयाइव
(सूत्रकृतांग- 1/1/3/9) जो अपनी अपनी युक्तियों से लोक को कृत, किया हुआ (बनाया हुआ) कहते हैं, वे वस्तु- स्वरूप को नहीं जानते। क्योंकि लोक कभी भी विनाशी नहीं है। (यदि कृत होता तो विनाशी होता।)
(8) न कर्तृत्वं न कर्माणि, लोकस्य सृजति प्रभुः। न कर्म-फल-संयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते ॥
(गीता-5/14-15) ईश्वर जीव को न कर्ता बनाता है, न उनके लिए कर्म या कर्मफल की सृष्टि करता है। यह सब स्वभाव से होता है।
संसार या लोक ईश्वररचित नहीं। यह त्रिकाली शाश्वत है। जहां तक जीव व संसार के मध्य भोक्ता व भोग्य के सम्बन्ध रूप 'संसार' (जीव-संसरण) की बात है, उसमें भी कोई ईश्वर कारण नहीं, जीव की कामभोगतृष्णा व विषयसेवन की लालसा ही उक्त संसरण में मूल कारण है। वीतराग आत्मा रहता तो संसार में ही है, पर उसके लिए संसार भोग्य नहीं रह जाताये कुछ दार्शनिक विचार-बिन्दु हैं जिन पर वैदिक व जैन धर्म-परम्परा में सहमति दृष्टिगोचर होती है।