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जरा जाव न पीलेइ, वाही जाव न वड्ढई। जाविंदिया न हायंति, ताव धम्म समायरे॥
(दशवैकालिक सूत्र-8/36) -जब तक बुढ़ापा नहीं सताता, रोग नहीं बढ़ते, इन्द्रियां हीनअशक्त नहीं हो जाती, तब तक धर्म का आचरण कर लेना चाहिए।
न व्याधयो नापि यमः प्राप्तुं श्रेयः प्रतीक्षते। यावदेव भवेत् कल्पस्तावच्छेयः समाचरेत्॥
__ (महाभारत-2/56/10) - रोग और यम (मृत्यु) इस बात की प्रतीक्षा नहीं करते कि इसने श्रेय प्राप्त कर लिया है या नहीं। अतः जब तक अपने में सामर्थ्य हो, बस, तभी तक अपने हित का साधन कर लेना चाहिए।
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काल की गति को रोक पाना तो सम्भव नहीं, किन्तु धर्माराधना से इसका सदुपयोग कर आत्मकल्याण किया जा सकता है। आत्मकल्याण कर सिद्ध - बुद्ध-मुक्त होने वाले व्यक्ति कालजयी होते हैं- यह सत्य वैदिक व जैन-इन दोनों धर्मों के साहित्य में मुखरित हुआ है।
तृतीयः खण्ड/451