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(6) विमुक्तं सर्वसर्वङ्गेभ्यो मुनिमाकाशवत् स्थितम्। अस्वमेकचरं शान्तं तं देवा ब्राह्मणं विदुः॥
(महाभारत, 12/245/22) -जो सभी आसक्तियों से रहित है, आकाश की तरह जिसकी वृत्ति निर्लिप्त है, अपरिग्रही है, एकाकी विचरणशील है और शान्त (स्वभावी) है, उसे देवता ब्राह्मण कहते हैं।
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ब्रह्म का अर्थ है-आत्मा या परमेश्वर। जिसमें आत्मीय श्रेष्ठगुण हों या परमेश्वरत्व की प्राप्ति में सक्षम सद्गुण हों-वहीं ब्राह्मण हो सकता है। वैदिक व जैन धर्म के आचार्यों ने इसी सत्य को अपनी-अपनी भाषा में अभिव्यक्त किया है।
तीय सण्ड:433