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(2) तपसा ब्राह्मणो जातस्तस्माजातिरकारणम्।
(महाभारत) - (चाण्डाल और मच्छीमार आदि के घर में जन्मे) अधम कहे जाने वाले लोगों ने भी तपस्या से ब्राह्मणत्व प्राप्त कर लिया, इसलिए जाति कोई तात्त्विक वस्तु नहीं है।
(3) सक्खं खुदीसइ तवो-विसेसो। न दीसइ जाइ-विसेस कोई॥
(उत्तराध्ययन सूत्र-12/37) -जाति की कोई विशेषता नहीं है, तपस्या का ही प्रभाव साक्षात् देखा जाता है।
(4) शूद्रो ब्राह्मणतामेति ब्राह्मणश्चैति शूद्रताम्।
(मनुस्मृति-10/65) -सदाचार के पालन से शूद्र ब्राह्मण हो सकता है और बुरे आचरण से ब्राह्मण भी शूद्र।
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श्रेष्ठता का निर्धारण सद्गुणों व सदाचारों के आधार पर करणीय है, न कि उस वंश या कुल के आधार पर जहां वह व्यक्ति जन्मा है। यह तथ्य वैदिक व जैन - दोनों धर्मों के आचार्यों द्वारा समान रूप से स्वीकृत है, जिसकी पुष्टि उपर्युक्त उद्धरणों से स्पष्ट होती है।
जन धर्म दिला धर्म की सारा तिन
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