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वर्ण व जाति के रूप में सामाजिक विभाजन की परम्परा प्राचीन काल से भारत में प्रवर्तमान है। उस विभाजन का आधार गुण-कर्म या जन्म होइस पर विचारकों में कभी-कभी मतभेद भी रहा है। किन्तु अनेक प्रसिद्ध भारतीय मनीषियों के अनुसार जाति का आधार जन्म नहीं होना चाहिए, गुण व कर्म होना चाहिए। वैदिक परम्परा की गीता में स्वयं श्रीकृष्ण का कथन है- चातुर्वयं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः (गीता-) अर्थात् चारों वर्गों की रचना गुण-कर्म के अनुसार की गई है। जैन परम्परा भी प्रारम्भ के अनुसार ही सामाजिक विभाजन की पक्षधर रही है। जन्म से कोई ऊंच या नीच नहीं होता, गुण व कर्म के आधार पर ही कोई श्रेष्ठ या अधम होता है-इस मान्यता को वैदिक व जैन-दोनों धर्मों के साहित्य में रेखांकित किया गया है।
(1) कम्मुणा बंभणो होइ, कम्मुणा होईखत्तिओ। वइस्सो कम्मुणा होइ, सुद्दो हवइ कम्मुणा॥
(उत्तराध्ययन सूत्र-25/33) - मनुष्य अपने कर्म (आचरण) से ही ब्राह्मण होता है एवं क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र भी कर्म से ही होता है।
Jीय रसापड 429